श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 4: गजेन्द्र का वैकुण्ठ गमन  »  श्लोक 3-4

 
श्लोक
योऽसौ ग्राह: स वै सद्य: परमाश्चर्यरूपधृक् ।
मुक्तो देवलशापेन हूहूर्गन्धर्वसत्तम: ॥ ३ ॥
प्रणम्य शिरसाधीशमुत्तमश्लोकमव्ययम् ।
अगायत यशोधाम कीर्तन्यगुणसत्कथम् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; असौ—वह; ग्राह:—घडिय़ाल बन गया; स:—वह; वै—निस्सन्देह; सद्य:—तुरन्त; परम—अत्यन्त सुन्दर; आश्चर्य— अद्भुत; रूप-धृक्—रूप धारण किये (अपने मूल गन्धर्व रूप को); मुक्त:—मुक्त हो गया; देवल-शापेन—देवल ऋषि के शाप से; हूहू:—हूहू नामक; गन्धर्व-सत्तम:—गन्धर्वों में श्रेष्ठ; प्रणम्य—प्रणाम करके; शिरसा—सिर के बल; अधीशम्—परम प्रभु को; उत्तम-श्लोकम्—श्रेष्ठ श्लोकों द्वारा पूजा किया जाने वाला; अव्ययम्—नित्य; अगायत—उच्चारण करने लगा; यश: धाम—भगवान् की महिमा; कीर्तन्य-गुण-सत्-कथम्—जिसकी दिव्य लीलाएँ तथा गुण यशस्वी हैं ।.
 
अनुवाद
 
 गन्धर्वों में श्रेष्ठ राजा हूहू देवल मुनि द्वारा शापित होने के बाद घडिय़ाल बन गया था। अब भगवान् द्वारा उद्धार किये जाने पर उसने एक सुन्दर गन्धर्व का रूप धारण कर लिया। यह समझकर कि यह सब किसकी कृपा से सम्भव हो सका, उसने तुरन्त सिर के बल प्रणाम किया और श्रेष्ठ श्लोकों से पूजित होने वाले परम नित्य भगवान् के लिए उपयुक्त स्तुतियाँ कीं।
 
तात्पर्य
 जिस तरह गन्धर्व घडिय़ाल बना उसकी कथा आगे कही जायेगी। जिस शाप से गन्धर्व को यह पद मिला था वह वास्तव में शाप नहीं था अपितु वरदान था। जब किसी को कोई सन्त पुरुष शाप दे तो अप्रसन्न नहीं होना चाहिए क्योंकि अप्रत्यक्ष रूप से उसका यह शाप वरदान होता है। इस गन्धर्व में स्वर्गलोक के निवासी की मानसिकता थी। इसे
भगवान् का पार्षद बनने में लाखों वर्ष लगते। किन्तु देवल ऋषि के शाप से वह घडिय़ाल बन गया और एक ही जीवन में उसे साक्षात् भगवान् का दर्शन करने तथा वैकुण्ठ जाकर भगवान् का पार्षद बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसी प्रकार गजेन्द्र का भी उद्धार भगवान् ने किया जब वह अगस्त्य मुनि के शाप से मुक्त हो गया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥