श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 45

 
श्लोक
स त्वं नो दर्शयात्मानमस्मत्करणगोचरम् ।
प्रपन्नानां दिद‍ृक्षूणां सस्मितं ते मुखाम्बुजम् ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (भगवान्); त्वम्—तुम मेरे भगवान् हो; न:—हमारे लिए; दर्शय—दिखाई पड़ो; आत्मानम्—अपने मूल रूप में; अस्मत्-करण-गोचरम्—हमारी प्रत्यक्ष इन्द्रियों द्वारा विशेष रूप से आँखों से देखने योग्य; प्रपन्नानाम्—हम सभी शरणागतों का; दिदृक्षूणाम्—फिर भी आपको देखने को इच्छुक; सस्मितम्—मुस्काते; ते—तुम्हारा; मुख-अम्बुजम्—कमल जैसा मुख ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्! हम आपके शरणागत हैं फिर भी हम आपका दर्शन करना चाहते हैं। कृपया अपने आदि रूप को तथा अपने मुस्काते मुख को हमारे नेत्रों को दिखलाइये और अन्य इन्द्रियों द्वारा अनुभव करने दीजिये।
 
तात्पर्य
 भक्तगण भगवान् को उनके आदि रूप में उनके कमल सदृश मुस्काते मुख सहित देखना चाहते हैं। वे निराकार रूप की अनुभूति में रुचि नहीं रखते। भगवान् के साकार तथा निराकार दोनों ही रूप होते हैं। निर्विशेषवादियों को भगवान् के साकार रूप का कोई बोध नहीं होता, किन्तु ब्रह्माजी तथा उनकी शिष्य परम्परा वाले सदस्य भगवान् को उनके साकार रूप में देखना चाहते हैं। साकार रूप के बिना मुस्काते मुख की बात
ही नहीं उठती, जिसका स्पष्ट संकेत यहाँ सस्मितम् ते मुखाम्बुजम् शब्दों से मिलता है। जो लोग ब्रह्मा के वैष्णव सम्प्रदाय के हैं, वे सदैव भगवान् का दर्शन करना चाहते हैं। वे भगवान् के साकार रूप का साक्षात्कार करना चाहते हैं, निराकार रूप का नहीं। जैसाकि यहाँ पर स्पष्ट कहा गया है—अस्मत् करण-गोचरम्—भगवान् के साकार रूप की अनुभूति हम अपनी इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्षत: कर सकते हैं।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥