श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 5

 
श्लोक
वैकुण्ठ: कल्पितो येन लोको लोकनमस्कृत: ।
रमया प्रार्थ्यमानेन देव्या तत्प्रियकाम्यया ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
वैकुण्ठ:—वैकुण्ठ लोक; कल्पित:—बनाया गया; येन—जिसके द्वारा; लोक:—लोक; लोक-नमस्कृत:—सभी लोकों द्वारा पूजित; रमया—रमा, धन की देवी द्वारा; प्रार्थ्यमानेन—प्रार्थना किये जाने पर; देव्या—देवी द्वारा; तत्—उसको; प्रिय- काम्यया—प्रसन्न करने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 धन की लक्ष्मी (रमा) को प्रसन्न करने के लिए भगवान् वैकुण्ठ ने उनकी प्रार्थना पर एक अन्य वैकुण्ठ लोक की रचना की जो सब के द्वारा पूजा जाता है।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की टिप्पणी है कि यह वैकुण्ठ लोक श्रीमद्भागवत की तरह प्रकट होता है और उत्पन्न हुआ या सृजित कहलाता है, किन्तु श्रीमद्भागवत तथा वैकुण्ठ दोनों ही आठ प्रकार के आवरणों से ढके भौतिक ब्रह्माण्डों से परे सदैव विद्यमान रहते
हैं। जैसाकि द्वितीय स्कंध में बताया जा चुका है, ब्रह्मा ने ब्रह्माण्ड की सृष्टि के पूर्व वैकुण्ठ देखा था। वीरराघव आचार्य उल्लेख करते हैं कि यह वैकुण्ठ इस ब्रह्माण्ड के भीतर है। यह लोकालोक नामक पर्वत के ऊपर स्थित है और सबके द्वारा पूजित है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥