श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 8

 
श्लोक
इन्द्रो मन्त्रद्रुमस्तत्र देवा आप्यादयो गणा: ।
मुनयस्तत्र वै राजन्हविष्मद्वीरकादय: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
इन्द्र:—स्वर्ग का राजा; मन्त्रद्रुम:—मंत्रद्रुम नाम का; तत्र—छठे मन्वन्तर में; देवा:—देवतागण; आप्य-आदय:—आप्य तथा अन्य; गणा:—वह सभा; मुनय:—सप्तर्षि; तत्र—वहाँ; वै—निस्सन्देह; राजन्—हे राजा; हविष्मत्—हविष्मान् नाम का; वीरक-आदय:—वीरक तथा अन्य ।.
 
अनुवाद
 
 चाक्षुष मनु के राज्यकाल में स्वर्ग का राजा मंत्रद्रुम के नाम से विख्यात था। देवताओं में आप्यगण तथा सप्तर्षियों में हविष्मान् तथा वीरक प्रमुख थे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥