श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 6: देवताओं तथा असुरों द्वारा सन्धि की घोषणा  »  श्लोक 12

 
श्लोक
यथाग्निमेधस्यमृतं च गोषु
भुव्यन्नमम्बूद्यमने च वृत्तिम् ।
योगैर्मनुष्या अधियन्ति हि त्वां
गुणेषु बुद्ध्या कवयो वदन्ति ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस तरह; अग्निम्—अग्नि; एधसि—काष्ठ में; अमृतम्—अमृत तुल्य दुग्ध; च—तथा; गोषु—गायों में; भुवि—भूमि पर; अन्नम्—अनाज; अम्बु—जल; उद्यमने—उद्यम में; च—भी; वृत्तिम्—जीविका; योगै:—भक्तियोग के अभ्यास से; मनुष्या:—लोग; अधियन्ति—प्राप्त करते हैं; हि—निस्सन्देह; त्वाम्—तुमको; गुणेषु—गुणों में; बुद्ध्या—बुद्धि से; कवय:— महापुरुष; वदन्ति—कहते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 जिस प्रकार काठ से अग्नि, गाय के थन से दूध, भूमि से अन्न तथा जल और औद्योगिक उद्यम से जीविका के लिए समृद्धि प्राप्त की जा सकती है उसी तरह इस भौतिक जगत में मनुष्य भक्तियोग के अभ्यास द्वारा आपकी कृपा प्राप्त कर सकता है या बुद्धि से आपके पास पहुँच सकता है। जो पुण्यात्मा हैं, वे इसकी पुष्टि करते हैं।
 
तात्पर्य
 यद्यपि भगवान् निर्गुण हैं और इस भौतिक जगत के भीतर नहीं पाये जाते, तथापि सारा भौतिक जगत उनसे व्याप्त है जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है (मया ततमिदं सर्वम् )। यह भौतिक जगत भगवान् की भौतिक शक्ति के प्रसार के अतिरिक्त कुछ नहीं है और सारा जगत उन्हीं पर टिका है (मत्स्थानि सर्वभूतानि)। फिर भी भगवान् को यहाँ पर नहीं पाया जा सकता (न चाहं तेष्ववस्थित:)। किन्तु भक्तियोग के अभ्यास द्वारा भक्त भगवान् का दर्शन कर सकता है। सामान्यतया कोई व्यक्ति तब तक भक्तियोग का अभ्यास प्रारम्भ नहीं करता जब तक उसने पूर्वजन्म में इसका अभ्यास न किया हो। इसके अतिरिक्त गुरु तथा कृष्ण की कृपा से ही भक्तियोग शुरू किया जा सकता है। गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्तिलता-बीज। भक्तियोग का बीज गुरु तथा भगवान् कृष्ण की कृपा से प्राप्य है।
केवल भक्तियोग के अभ्यास से ही भगवान् की कृपा प्राप्त की जा सकती है और उनका साक्षात्कार किया जा सकता है (प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन सन्त: सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति) भगवान् को कर्म, ज्ञान या योग जैसी अन्य विधियों से नहीं देखा जा सकता। मनुष्य भक्तियोग का अनुशीलन गुरु के निर्देशन में कर सकता है (श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पाद-सेवनम् )। तब भक्त भगवान् को इस जगत में भी देख सकता है यद्यपि वे अदृश्य रहते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में (भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वत:) तथा श्रीमद्भागवत में (भक्त्याहमेकया ग्राह्य:) हुई है। इस प्रकार भक्ति के द्वारा भगवान् की अनुकम्पा प्राप्त की जा सकती है यद्यपि अभक्तों को वे न तो दिखते हैं न ही उनकी समझ में आते हैं।

इस श्लोक में भक्तियोग के अनुशीलन की तुलना कई भौतिक कार्यकलापों से की गई है। काष्ठ को रगडऩे से अग्नि प्राप्त हो सकती है, धरती को खोदने से अन्न तथा जल मिल सकता है और गाय के थन को दुहने से अमृततुल्य दूध प्राप्त हो सकता है। दूध की तुलना अमृत से की गई है, जिसे पीकर अमर बना जा सकता है। हाँ, केवल दूध पीने से कोई अमर नहीं हो जाता, किन्तु दूध आयु की अवधि को बढ़ा सकता है। आधुनिक सभ्यता में लोग दूध को महत्त्वपूर्ण नहीं मानते अतएव वे दीर्घजीवी नहीं होते। यद्यपि इस युग में लोग एक सौ वर्षों तक जीवित रह सकते हैं, किन्तु अधिक मात्रा में दूध न पीने के कारण उनकी आयु घट जाती है। यह कलियुग का लक्षण है। कलियुग में लोग दूध पीने की अपेक्षा पशु का वध करके उसका मांस खाना अधिक अच्छा मानते हैं। भगवद्गीता में दिये गये उपदेशों में भगवान् गोरक्षा का उपदेश देते हैं। गायों की सुरक्षा करनी चाहिए, उनसे दूध प्राप्त करना चाहिए और इस दूध के विविध पकवान बनाने चाहिए। मनुष्य को चाहिए कि पर्याप्त दूध पिये। इससे उसकी आयु बढ़ सकती है, मस्तिष्क विकसित हो सकता है, वह भक्ति कर सकेगा और अन्तत: भगवान् की कृपा प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार अन्न तथा जल प्राप्त करने के लिए धरती को खोदना आवश्यक है उसी प्रकार गायों को सुरक्षा प्रदान करना और उनके थनों से अमृत-तुल्य दूध प्राप्त करना आवश्यक है।

इस युग के लोग सुखी जीवन के लिए औद्योगिक उद्यमों में प्रवृत्ति रखते हैं, किन्तु वे उस भक्ति को करने से इनकार करते हैं जिससे उन्हें भगवद्धाम वापस जाकर जीवन का अन्तिम लक्ष्य प्राप्त हो सकता है। दुर्भाग्यवश, जैसाकि कहा गया है—न ते विदु: स्वार्थ-गतिं हि विष्णुं दुराशया ये बहिरर्थमानिन:। आध्यात्मिक ज्ञान से विहीन लोग यह नहीं जानते कि जीवन का अन्तिम लक्ष्य भगवद्धाम को वापस जाना है। जीवन के इस उद्देश्य को भुलाकर वे निराशा तथा हताशा में कठोर श्रम करते रहते हैं। (मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतस:)। तथाकथित वैश्य लोग—उद्योगपति या व्यापारी—बड़े-बड़े औद्योगिक उद्यमों में लगे हैं, किन्तु वे अन्न तथा दूध में कोई रुचि नहीं रखते। किन्तु जैसाकि यहाँ पर संकेत किया गया है, मरुस्थल में भी धरती खोदकर जल प्राप्त करके अन्न उत्पन्न किया जा सकता है। जब हम अन्न तथा तरकारी उत्पन्न करते हैं, तो गायों को संरक्षण प्राप्त हो सकता है और इन गायों से प्रचुर दूध मिल सकता है। पर्याप्त दूध मिलने से तथा इसे अन्न और तरकारी के साथ मिलाकर हम सैंकड़ों अमृतमय व्यंजन तैयार कर सकते हैं। हम इन व्यंजनों को खा सकते हैं और औद्योगिक उद्यमों से तथा बेकारी से बच सकते हैं।

कृषि तथा गोरक्षा निष्पाप होने के साधन हैं और इन से भक्ति के प्रति आकृष्ट हुआ जा सकता है। जो लोग पापी हैं, वे भक्ति के प्रति अनुरक्त नहीं होते। जैसाकि भगवद्गीता (७.२८) में कहा गया है—

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता: ॥

“जिन लोगों ने पूर्वजन्मों में तथा इस जन्म में पुण्य कार्य किये हैं, जिनके पाप समूल नष्ट हो चुके हैं तथा जो मोह के द्वन्द्व से मुक्त हैं, वे संकल्पपूर्वक मेरी सेवा में प्रवृत्त होते हैं।” इस कलियुग में अधिकांश लोग पापी, अल्पायु, अभागे तथा विक्षुब्ध हैं (मन्दा: सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुता:) उनके लिए चैतन्य महाप्रभु ने सलाह दी है—

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।

कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥

“इस कलह तथा कपट के युग में उद्धार का एकमात्र साधन भगवान् के पवित्र नाम का जप है। इसका कोई अन्य रास्ता नहीं है। कोई अन्य रास्ता नहीं है। कोई अन्य रास्ता नहीं है।”

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥