श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 6: देवताओं तथा असुरों द्वारा सन्धि की घोषणा  »  श्लोक 14

 
श्लोक
स त्वं विधत्स्वाखिललोकपाला
वयं यदर्थास्तव पादमूलम् ।
समागतास्ते बहिरन्तरात्मन्
किं वान्यविज्ञाप्यमशेषसाक्षिण: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; त्वम्—आप; विधत्स्व—कृपया जो आवश्यक हो करें; अखिल-लोक-पाला:—देवता, इस ब्रह्माण्ड के विभिन्न विभागों के निर्देशक; वयम्—हम सभी; यत्—जो; अर्था:—प्रयोजन; तव—आपके; पाद-मूलम्—चरणकमलों पर; समागता:—हम आये हैं; ते—आपको; बहि:-अन्त:-आत्मन्—हे सबके परमात्मा, हे बाह्य तथा अन्तर के सतत साक्षी; किम्— क्या; वा—अथवा; अन्य-विज्ञाप्यम्—आपको सूचित करते हैं; अशेष-साक्षिण:—हर वस्तु के साक्षी तथा ज्ञाता ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्! हम विविध देवता, इस ब्रह्माण्ड के निर्देशक आपके चरणकमलों के निकट आये हैं। जिस प्रयोजन से हम आये हैं कृपया उसे पूरा करें। आप भीतर तथा बाहर से हर वस्तु के साक्षी हैं। आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है, अतएव आपको किसी बात के लिए पुन: सूचित करना व्यर्थ है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (१३.३) में कहा गया है—क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। जीवात्माएँ अपने-अपने शरीर की स्वामी हैं, किन्तु भगवान् सभी शरीरों के स्वामी हैं। चूँकि वे हर एक के शरीर के साक्षी हैं, अतएव उनसे कुछ भी छिपा नहीं है। वे जानते हैं कि हमें क्या चाहिए। अतएव हमारा कर्तव्य
है कि गुरु के निर्देशन में निष्ठापूर्वक भक्ति करें। भक्ति करने के लिए हमें जो भी चाहिए उसकी पूर्ति कृपा-पूर्वक कृष्ण करेंगे। कृष्णभावनामृत आन्दोलन में हमें कृष्ण तथा गुरु के आदेशों मात्र को पूरा करना होता है। तब हमारी सारी आवश्यकताएँ हमारे न माँगने पर भी कृष्ण द्वारा पूरी हो जायेंगी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥