श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 6: देवताओं तथा असुरों द्वारा सन्धि की घोषणा  »  श्लोक 2

 
श्लोक
तेनैव सहसा सर्वे देवा: प्रतिहतेक्षणा: ।
नापश्यन्खं दिश: क्षौणीमात्मानं च कुतो विभुम् ॥ २॥
 
शब्दार्थ
तेन एव—इसके कारण; सहसा—एकाएक; सर्वे—सभी; देवा:—देवतागण; प्रतिहत-ईक्षणा:—उनकी दृष्टि चकाचौंध हो गई; न—नहीं; अपश्यन्—देख सके; खम्—आकाश को; दिश:—दिशाओं को; क्षौणीम्—पृथ्वी को; आत्मानम् च—तथा अपने आपको भी; कुत:—तथा देखने का प्रश्न ही कहाँ है; विभुम्—परमेश्वर को ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के तेज से सारे देवताओं की दृष्टि चौंधिया गई। वे न तो आकाश, दिशाएँ, पृथ्वी देख सके, न ही अपने आपको देख सके। अपने समक्ष उपस्थित भगवान् को देखना तो दूर रहा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥