श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 6: देवताओं तथा असुरों द्वारा सन्धि की घोषणा  »  श्लोक 36

 
श्लोक
तांस्तथा भग्नमनसो भग्नबाहूरुकन्धरान् ।
विज्ञाय भगवांस्तत्र बभूव गरुडध्वज: ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
तान्—सारे देवता तथा असुर; तथा—तत्पश्चात्; भग्न-मनस:—हताश होकर; भग्न-बाहु—टूटी बाँहों वाले; ऊरु—जाँघें; कन्धरान्—तथा कंधे; विज्ञाय—जानते हुए; भगवान्—भगवान् विष्णु; तत्र—वहाँ; बभूव—प्रकट हुए; गरुड-ध्वज:—गरुड़ पर सवार ।.
 
अनुवाद
 
 देवता तथा असुर हताश तथा विक्षुब्ध थे और उनकी भुजाएँ, जाँघें तथा कंधे टूट गये थे। अतएव गरुड़ की पीठ पर सवार सर्वज्ञ भगवान् वहाँ पर प्रकट हुए।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥