श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 6: देवताओं तथा असुरों द्वारा सन्धि की घोषणा  »  श्लोक 38

 
श्लोक
गिरिं चारोप्य गरुडे हस्तेनैकेन लीलया ।
आरुह्य प्रययावब्धिं सुरासुरगणैर्वृत: ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
गिरिम्—पर्वत को; च—भी; आरोप्य—रखकर; गरुडे—गरुड़ की पीठ पर; हस्तेन—हाथ से; एकेन—एक; लीलया—अपनी लीला के रूप में, आसानी से; आरुह्य—चढक़र; प्रययौ—चले गये; अब्धिम्—क्षीरसागर; सुर-असुर-गणै:—देवताओं तथा असुरों द्वारा; वृत:—घिरे हुए ।.
 
अनुवाद
 
 फिर भगवान् ने पर्वत को अत्यन्त सरलतापूर्वक एक हाथ से उठाकर गरुड़ की पीठ पर रख दिया। तब वे स्वयं गरुड़ पर सवार हुए और देवताओं तथा असुरों से घिरे हुए क्षीरसागर चले गये।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर सर्वोपरि भगवान् के सर्वशक्तिमान होने का प्रमाण प्राप्त है। जीवों की दो श्रेणियाँ हैं—असुर तथा देवता—किन्तु भगवान् इन दोनों के ऊपर हैं। असुरगण सृष्टि के अवसर-वाद सिद्धान्त में विश्वास करते हैं, किन्तु देवता भगवान् के हाथों से बनी सृष्टि पर विश्वास करते हैं। यहाँ पर भगवान् की सर्वशक्तिमत्ता सिद्ध हो जाती है क्योंकि उन्होंने मन्दर पर्वत, असुरों तथा देवताओं को मात्र एक ही हाथ से उठाकर गरुड़ की पीठ पर रखा और सब को क्षीरसागर ले आये। देवता तथा भक्त इस घटना को यह जानते हुए कि भगवान् किसी भी वस्तु को चाहे वह कितनी भी भारी क्यों न हो उठा सकते हैं तुरन्त स्वीकार कर लेंगे, किन्तु दानव इस घटना को सुनकर यही कहेंगे कि यह पौराणिक है, यद्यपि वे भी देवताओं के साथ भगवान् द्वारा ले जाये गये थे। किन्तु क्या सर्वशक्तिमान
भगवान् के लिए पर्वत उठाना कठिन है? चूँकि उन्होंने लाखों मन्दर-पर्वतों से युक्त असंख्य लोकों को तैरा रखा है, तो फिर वे उनमें से एक पर्वत को अपने हाथ से क्यों नहीं उठा सकते हैं? यह पौराणिक कथा नहीं है अपितु विश्वास करने वालों तथा अश्रद्धालुओं में यही अन्तर है कि देवता वैदिक साहित्य में वर्णित घटनाओं को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं, किन्तु दानव केवल विवाद करते हैं और कहते हैं कि ये ऐतिहासिक घटनाएँ मात्र पौराणिक कथाएँ हैं। असुरगण यही व्याख्या करना श्रेष्ठ समझते हैं कि इस जगत की सारी घटनाएँ “अकस्मात्” से होती हैं, किन्तु भक्तगण अथवा देवगण किसी भी घटना को अवसरजनित नहीं मानते। प्रत्युत वे जानते हैं कि प्रत्येक घटना भगवान् की योजना के अनुसार घटती है। देवों तथा दानवों के बीच यही अन्तर है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥