श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 22

 
श्लोक
त्वमेक: सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयो: ।
तं त्वामर्चन्ति कुशला: प्रपन्नार्तिहरं गुरुम् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम् एक:—निस्सन्देह तुम हो; सर्व-जगत:—तीनों लोकों के; ईश्वर:—नियन्ता; बन्ध-मोक्षयो:—बन्धन तथा मोक्ष दोनों के; तम्—उस नियन्ता को; त्वाम् अर्चन्ति—आपको पूजते हैं; कुशला:—धनधान्य चाहने वाले व्यक्ति; प्रपन्न-आर्ति-हरम्— शरणागत भक्तों के समस्त कष्टों का हरण करने वाला; गुरुम्—जो समस्त पतितात्माओं के लिए सदुपदेशक का कार्य करे उसे ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु! आप सारे विश्व के बन्धन तथा मोक्ष के कारण हैं क्योंकि आप इसके शासक हैं। जो लोग आध्यात्मिक चेतना में बढ़े-चढ़े हैं, वे आपकी शरण में जाते हैं, अतएव आप उनके कष्टों को दूर करने वाले हैं और उनकी मुक्ति के भी आप ही कारण हैं। अतएव हम आपकी पूजा करते हैं।
 
तात्पर्य
 वास्तव में विष्णु ही सारे सौभाग्य के पालन-पोषणहारे हैं। यदि मनुष्य विष्णु की शरण ग्रहण करता है, तो देवताओं ने शिवजी की शरण क्यों ग्रहण की? उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे भौतिक संसार की सृष्टि शिवजी के माध्यम से करते हैं और शिवजी विष्णु की ओर से कार्य करते हैं। जब भगवान् भगवद्गीता (१४.४) में यह कहते हैं कि वे सारे जीवों के पिता हैं (अहं बीजप्रद: पिता) तो यह शिवजी के माध्यम से विष्णु
द्वारा सम्पन्न कार्यों का द्योतक है। भगवान् विष्णु सदैव भौतिक कार्यकलापों से विरक्त रहते हैं और जब उन्हें भौतिक कार्यकलाप सम्पन्न करने होते हैं, तो वे शिवजी के माध्यम से करते हैं। अतएव शिवजी की पूजा विष्णु के स्तर पर की जाती है। जब विष्णु बहिरंगा शक्ति से अछूते रहते हैं, तो वे भगवान् विष्णु होते हैं, किन्तु जब वे उसके सम्पर्क में रहते हैं, तो वे शिवजी के रूप में प्रकट होते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥