श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 38

 
श्लोक
आसां प्राणपरीप्सूनां विधेयमभयं हि मे ।
एतावान्हि प्रभोरर्थो यद् दीनपरिपालनम् ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
आसाम्—ये सारे जीव; प्राण-परीप्सूनाम्—अपने जीवन की रक्षा के लिए अत्यन्त उत्सुक; विधेयम्—कुछ न कुछ करना चाहिए; अभयम्—सुरक्षा; हि—निस्सन्देह; मे—मेरे द्वारा; एतावान्—इतना; हि—निस्सन्देह; प्रभो:—प्रभु का; अर्थ:—कर्तव्य; यत्—जो; दीन-परिपालनम्—पीडि़त मानवता को सुरक्षा प्रदान करना ।.
 
अनुवाद
 
 जीवन-संर्घष में लगे समस्त जीवों को सुरक्षा प्रदान करना मेरा कर्तव्य है। निश्चय ही स्वामी का कर्तव्य है कि वह पीडि़त अधीनस्थों की रक्षा करे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥