श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 41

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
एवमामन्‍त्र्य भगवान्भवानीं विश्वभावन: ।
तद् विषं जग्धुमारेभे प्रभावज्ञान्वमोदत ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्—इस प्रकार; आमन्त्र्य—सम्बोधित करके; भगवान्—शिवजी; भवानीम्—भवानी को; विश्व-भावन:—सारे विश्व के शुभचिन्तक; तत् विषम्—उस विष को; जग्धुम्—पीना; आरेभे—प्रारम्भ किया; प्रभाव-ज्ञा—शिवजी की सामर्थ्य को भलीभाँति जानने वाली माता भवानी ने; अन्वमोदत—अनुमति दी ।.
 
अनुवाद
 
 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार भवानी को सूचित करके शिवजी वह विष पीने लगे और भवानी ने उन्हें ऐसा करने की अनुमति दे दी क्योंकि वे शिवजी की क्षमताओं को भलीभाँति जानती थीं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥