श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 43

 
श्लोक
तस्यापि दर्शयामास स्ववीर्यं जलकल्मष: ।
यच्चकार गले नीलं तच्च साधोर्विभूषणम् ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—शिवजी की; अपि—भी; दर्शयाम् आस—प्रदर्शित किया; स्व-वीर्यम्—अपनी शक्ति; जल-कल्मष:—जल से उत्पन्न वह विष; यत्—जो; चकार—बनाया; गले—गर्दन में; नीलम्—नीली रेखा; तत्—वह; च—भी; साधो:—साधुपुरुष का; विभूषणम्—आभूषण, गहना ।.
 
अनुवाद
 
 अपयश के कारण क्षीरसागर से उत्पन्न विष ने मानो अपनी शक्ति का परिचय शिवजी के गले में नीली रेखा बनाकर दिया हो। किन्तु अब वही रेखा भगवान् का आभूषण मानी जाती है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥