श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 44

 
श्लोक
तप्यन्ते लोकतापेन साधव: प्रायशो जना: ।
परमाराधनं तद्धि पुरुषस्याखिलात्मन: ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
तप्यन्ते—स्वेच्छा से कष्ट उठाते हैं; लोक-तापेन—सामान्य लोगों के कष्ट के कारण; साधव:—साधुपुरुष; प्रायश:—प्राय:, सदैव; जना:—ऐसे पुरुष; परम-आराधनम्—पूजा की सर्वोच्च विधि; तत्—वह कार्य; हि—निस्सन्देह; पुरुषस्य—परम पुरुष का; अखिल-आत्मन:—जो सबका परमात्मा है ।.
 
अनुवाद
 
 कहा जाता है कि सामान्य लोगों के कष्टों के कारण महापुरुष सदैव स्वेच्छा से कष्ट भोगना स्वीकार करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्थित भगवान् के पूजने की यह सर्वोच्च विधि मानी जाती है।
 
तात्पर्य
 जो लोग अन्यों के कल्याण के लिए कार्य करने में व्यस्त रहते हैं, वे किस प्रकार भगवान् द्वारा तुरन्त मान्य होते हैं, इसकी व्याख्या यहाँ पर दी गई है। भगवद्गीता (१८.६८-६९) में भगवान् कहते हैं—य इदं परमं गुह्यं मदभक्तेष्वभिधास्यति... न च तस्मान् मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:—“जो व्यक्ति मेरे भक्तों को भगवद्गीता के सन्देश का उपदेश देता है, वह मुझे अत्यधिक प्रिय है। पूजा द्वारा मुझे तुष्ट करने में उससे बढक़र कोई नहीं हो सकता।” इस भौतिक जगत में अनेक प्रकार के कल्याणकार्य हैं, किन्तु परम कल्याणकार्य है कृष्णभावनामृत का प्रसार करना। अन्य कल्याणकार्य प्रभावशाली नहीं हो सकते क्योंकि प्रकृति के नियम तथा कर्मफल रोके नहीं जा सकते। भाग्य या कर्म के नियमों के कारण ही मनुष्य सुख या दुख पाता है। उदाहरणार्थ, यदि किसी को न्यायालय का आदेश मिलता है, तो उसे इसे स्वीकार करना चाहिए, चाहे इससे लाभ हो या हानि। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति कर्म तथा उसके फल के अधीन है। कोई इसे बदल नहीं सकता। इसलिए शास्त्र का वचन है—
तस्यैव हेतो: प्रयतेत कोविदो न लभ्यते यद् भ्रमतामुपर्यध: (भागवत १.५.१८) मनुष्य को उसके लिए प्रयास करना चाहिए जो कर्मफल के कारण ब्रह्माण्ड में ऊपर नीचे चक्कर लगाने से कभी भी प्राप्त नहीं हो पाता। वह क्या है? मनुष्य को कृष्णभावनाभावित होने का प्रयास करना चाहिए। यदि वह कृष्णभावनामृत को सारे विश्व में प्रसारित करने का प्रयत्न करता है, तो उसे श्रेष्ठतम कल्याणकार्य करने वाला समझना चाहिए। भगवान् स्वत: उससे अत्यधिक प्रसन्न होते हैं। यदि भगवान् उससे प्रसन्न हो जाते हैं, तो फिर उसके लिए प्राप्त करने को बचता ही क्या है? यदि भगवान् ने किसी को मान्यता दे दी है, तो वह भगवान् से भले ही कुछ न माँगे, किन्तु प्रत्येक हृदय में वास करने वाले भगवान् उस की हर आवश्यकता पूरी करते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में भी हुई है (तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् )। पुन:, जैसाकि यहाँ पर कहा गया है—तप्यन्ते लोकतापेन साधव: प्रायशो जना:। सर्वश्रेष्ठ कल्याणकार्य यही होगा कि लोगों को कृष्णभावनामृत के स्तर तक उठाया जाये क्योंकि बद्धजीव कृष्णभावनामृत के अभाव के कारण ही कष्ट भोग रहे हैं। स्वयं भगवान् भी मानवता के कष्ट को मिटाने के लिए अवतरित होते हैं—

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

“हे भरतवंशी! जब-जब और जहाँ-जहाँ धर्म की हानि होती है और अधर्म का प्राधान्य होता है उस समय मैं अवतरित होता हूँ। पुण्यात्माओं का उद्धार करने तथा दुष्टों का विनाश करने के अतिरिक्त धर्म की पुनर्स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में अवतरित होता हूँ।” भगवद्गीता (४.७-८)। अतएव सारे शास्त्रों का यही अभिमत है कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रसार ही विश्व का सर्वश्रेष्ठ कल्याणकार्य है। इसके फलस्वरूप सामान्य लोगों को जो परम लाभ मिलता है उसके कारण भगवान् भक्त द्वारा की गई सेवा को तुरन्त मान्यता प्रदान करते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥