श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 8

 
श्लोक
विलोक्य विघ्नेशविधिं तदेश्वरो
दुरन्तवीर्योऽवितथाभिसन्धि: ।
कृत्वा वपु: कच्छपमद्भ‍ुतं महत्
प्रविश्य तोयं गिरिमुज्जहार ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
विलोक्य—देखकर; विघ्न—व्यवधान (पर्वत का डूबना); ईश-विधिम्—दैवी व्यवस्था से; तदा—तब; ईश्वर:—भगवान्; दुरन्त-वीर्य:—अकल्पनीय शक्तिमान; अवितथ—अच्युत; अभिसन्धि:—जिसका संकल्प; कृत्वा—विस्तार करके; वपु:—शरीर; कच्छपम्—कछुवा; अद्भुतम्—विचित्र; महत्—विशाल; प्रविश्य—घुसकर; तोयम्—जल में; गिरिम्—पर्वत (मन्दर) को; उज्जहार—उठा लिया ।.
 
अनुवाद
 
 भगवदिच्छा से जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी उसे देखकर असीम शक्तिशाली एवं अच्युत संकल्प वाले भगवान् ने कछुए का अद्भुत रूप धारण किया और जल में प्रविष्ट होकर विशाल मन्दर पर्वत को उठा लिया।
 
तात्पर्य
 यहाँ इसका प्रमाण है कि भगवान् हर वस्तु के परम नियन्ता हैं। जैसा हम पहले वर्णन कर चुके हैं, मनुष्यों की दो श्रेणियाँ होती हैं—असुर तथा देवता—किन्तु इनमें से कोई भी परम शक्तिशाली नहीं होता। हरएक व्यक्ति का यह अनुभव है कि हम पर परम शक्ति द्वारा व्यवधान डाले जाते हैं। असुरगण इन व्यवधानों को मात्र संयोग मानते हैं, किन्तु भक्तगण इन्हें परम नियन्ता के कार्य मानते हैं। अतएव जब उन्हें व्यवधानों का सामना करना पड़ता है, तो वे भगवान् से प्रार्थना करते हैं। तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। भक्तगण व्यवधानों को यह मानकर सह लेते हैं कि वे भगवान् द्वारा उत्पन्न
हैं। वे उन्हें वरदान समझते हैं। किन्तु असुरगण परम नियन्ता को न समझ सकने के कारण ऐसे व्यवधानों को संयोग मानते हैं। यहाँ पर तो साक्षात् भगवान् उपस्थित थे। व्यवधान तो उनकी इच्छा के कारण उत्पन्न हुए थे और उनकी इच्छा से ही वे व्यवधान हट भी गये। भगवान् विशाल पर्वत को सहारा देने के लिए कच्छप रूप में प्रकट हुए। क्षितिरिह विपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे। भगवान् ने उस विशाल पर्वत को अपनी पीठ पर रख लिया। केशव धृतकूर्मशरीर जय जगदीश हरे। संकटों की सृष्टि भगवान् द्वारा की जा सकती है और वे उन्हीं के द्वारा दूर भी किये जा सकते हैं। यह भक्तों को ज्ञात रहता है, किन्तु असुरगण इसे नहीं समझ सकते।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥