श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
पीते गरे वृषाङ्केण प्रीतास्तेऽमरदानवा: ।
ममन्थुस्तरसा सिन्धुं हविर्धानी ततोऽभवत् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; पीते—पी लिये जाने पर; गरे—विष; वृष-अङ्केण—बैल पर बैठने वाले शिवजी द्वारा; प्रीता:—प्रसन्न होकर; ते—वे सब; अमर—देवतागण; दानवा:—तथा असुरगण; ममन्थु:—पुन: मथने लगे; तरसा—बड़े वेग से; सिन्धुम्—क्षीरसागर को; हविर्धानी—सुरभि गाय जो घी देने वाली है; तत:—उस मन्थन से; अभवत्— उत्पन्न हुई ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : शिवजी द्वारा विषपान कर लिये जाने पर देवता तथा दानव दोनों ही अत्यधिक प्रसन्न हुए और नवीन उत्साह के साथ समुद्र का मन्थन करने लगे। इसके फलस्वरूप सुरभि नामक गाय उत्पन्न हुई।
 
तात्पर्य
 सुरभि गाय को हविर्धानी कहा गया है क्योंकि वह मक्खन प्रदान करती है। मक्खन को पिघलाने से घी बनता है, जो बड़े-बड़े अनुष्ठानिक यज्ञों को सम्पन्न करने के लिए अनिवार्य होता है। जैसाकि भगवद्गीता (१८.५) में कहा गया है—यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्—मानव समाज में शान्ति तथा समृद्धि बनाये
रखने के लिए यज्ञ, दान तथा तपस्या अनिवार्य कर्म हैं। यज्ञ अनिवार्य है; यज्ञ करने के लिए घी नितान्त आवश्यक है और घी के लिए दूध आवश्यक है। दूध तभी उत्पन्न होता है जब पर्याप्त गौवें हों। अतएव भगवद्गीता (१८.४४) में गोरक्षा की संस्तुति की गई है (कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् )।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥