श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 10

 
श्लोक
तस्या आसनमानिन्ये महेन्द्रो महदद्भ‍ुतम् ।
मूर्तिमत्य: सरिच्छ्रेष्ठा हेमकुम्भैर्जलं शुचि ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
तस्या:—उसके लिए; आसनम्—आसन; आनिन्ये—ले आया; महा-इन्द्र:—स्वर्ग का राजा इन्द्र; महत्—यशस्वी; अद्भुतम्— विचित्र; मूर्ति-मत्य:—रूपों को स्वीकार करते हुए; सरित्-श्रेष्ठा:—विविध पवित्र नदियों में श्रेष्ठ; हेम—सुनहरे; कुम्भै:— जलपात्रों द्वारा; जलम्—जल; शुचि—शुद्ध ।.
 
अनुवाद
 
 स्वर्ग का राजा इन्द्र लक्ष्मीजी के बैठने के लिए उपयुक्त आसन ले आया। पवित्र जल वाली सारी नदियाँ—यथा गंगा तथा यमुना-साकार हो उठीं और उनमें से हर एक माता लक्ष्मी के लिए सुनहरे जलपात्र में शुद्ध जल ले आईं।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥