श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 11

 
श्लोक
आभिषेचनिका भूमिराहरत् सकलौषधी: ।
गाव: पञ्च पवित्राणि वसन्तो मधुमाधवौ ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
आभिषेचनिका:—अर्चाविग्रह की स्थापना के लिए आवश्यक साज-सामग्री; भूमि:—भूमि ने; आहरत्—एकत्र की; सकल— सभी तरह की; औषधी:—औषधियाँ तथा जड़ीबूटियाँ; गाव:—गाएँ; पञ्च—गाय से प्राप्त होने वाले पाँच प्रकार के पदार्थ यथा दूध, मट्ठा, घी, गोबर तथा गोमूत्र; पवित्राणि—अकलुषित; वसन्त:—साक्षात् वसन्त ऋतु; मधु-माधवौ—वसन्त ऋतु अथवा चैत्र और वैशाख मास में उत्पन्न होने वाले फल तथा फूल ।.
 
अनुवाद
 
 भूमि ने साकार होकर अर्चाविग्रह की स्थापना के लिए जड़ीबूटियाँ एकत्र कीं। गायों ने पाँच प्रकार के उत्पाद दिए—दूध, मट्ठा, घी, गोमूत्र तथा गोबर और साक्षात् वसन्त ऋतु ने चैत्र वैशाख (अप्रैल तथा मई) मास में उत्पन्न होने वाली हर वस्तु को एकत्र किया।
 
तात्पर्य
 वैदिक निर्देशों के अनुसार सम्पन्न होने वाले समस्त अनुष्ठानों में पञ्चगव्य अर्थात् गाय से प्राप्त पाँच पदार्थों—दूध, मट्ठा, घी, गोबर तथा गोमूत्र—की आवश्यकता होती है। गोमूत्र तथा गोबर कल्मषहीन होते हैं और चूँकि ये दोनों भी महत्त्वपूर्ण हैं अतएव मानव सभ्यता के लिए इस पशु की उपयोगिता का अनुमान लगाया जा सकता है। इसीलिए भगवान् कृष्ण गोरक्ष्य अर्थात् गाय-संरक्षण के पक्षधर हैं। जो सभ्यलोग वर्णाश्रम पद्धति का अनुसरण करते हैं, विशेष रूप से कृषि तथा व्यापार में लगा रहने
वाला वैश्य वर्ग, उन्हें चाहिए कि गायों को संरक्षण प्रदान करें। दुर्भाग्यवश कलियुग में लोग मन्दा: तथा सुमन्दमतय: होते हैं अतएव वे हजारों गायों का वध करते हैं। अतएव वे आध्यात्मिक चेतना में हतभाग्य होते हैं और प्रकृति उन्हें नाना प्रकार से विशेषतया कैंसर जैसे असाध्य रोगों से तथा विभिन्न राष्ट्रों में बारम्बार होने वाले युद्धों से विचलित करती रहती है। जब तक मानव समाज कसाईघरों में गायों का लगातार वध होने देगा तब तक शान्ति तथा समृद्धि का प्रश्न ही नहीं उठ सकता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥