श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 12

 
श्लोक
ऋषय: कल्पयांचक्रुराभिषेकं यथाविधि ।
जगुर्भद्राणि गन्धर्वा नट्यश्च ननृतुर्जगु: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
ऋषय:—ऋषिगण ने; कल्पयाम् चक्रु:—सम्पन्न किया; आभिषेकम्—अभिषेक समारोह, जिसे अर्चाविग्रह की स्थापना के समय किया जाता है; यथा-विधि—जैसाकि प्रामाणिक शास्त्रों में निर्देश हुआ है; जगु:—वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया; भद्राणि—सारा सौभाग्य; गन्धर्वा:—तथा गन्धर्व लोक के निवासी; नट्य:—व्यावसायिक नर्तकियाँ; च—भी; ननृतु:—उस अवसर पर बहुत सुन्दर नृत्य किया; जगु:—वेदों द्वारा बताये प्रामाणिक गीतों को गाया ।.
 
अनुवाद
 
 ऋषियों ने प्रामाणिक शास्त्रों में निर्दिष्ट विधि से सौभाग्य की देवी (लक्ष्मी) का अभिषेक उत्सव सम्पन्न किया; गन्धर्वों ने सर्वमंगलकारी वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया और व्यावसायिक नर्तकियों ने सुन्दर नृत्य किया तथा वेदों द्वारा बताये गये प्रामाणिक गीतों को गाया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥