श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 13

 
श्लोक
मेघा मृदङ्गपणवमुरजानकगोमुखान् ।
व्यनादयन् शङ्खवेणुवीणास्तुमुलनि:स्वनान् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
मेघा:—साक्षात् बादलों ने; मृदङ्ग—ढोल; पणव—नगाड़े; मुरज—एक अन्य प्रकार का ढोल; आनक—एक अन्य प्रकार का ढोल; गोमुखान्—एक प्रकार की तुरही; व्यनादयन्—बजाया, झंकृत किया; शङ्ख—शंख; वेणु—बाँसुरी; वीणा:—वीणाएँ; तुमुल—कानों को फाडऩे वाली; नि:स्वनान्—ध्वनि ।.
 
अनुवाद
 
 साक्षात् बादलों ने तरह-तरह के ढोल—यथा मृदंग, पणव, मुरज तथा आनक—बजाये। उन्होंने शंख तथा गोमुख नामक तुरहियाँ भी बजाईं और बाँसुरी तथा वीणा का वादन किया। इन सब वाद्ययंत्रों की सम्मिलित ध्वनि अत्यन्त तुमुलपूर्ण थी।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥