श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 15

 
श्लोक
समुद्र: पीतकौशेयवाससी समुपाहरत् ।
वरुण: स्रजं वैजयन्तीं मधुना मत्तषट्पदाम् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
समुद्र:—समुद्र ने; पीत-कौशेय—पीला रेशम; वाससी—पोशाक के ऊपर तथा नीचे के भाग; समुपाहरत्—भेंट किया; वरुण:—जल के अधिष्ठाता देवता ने; स्रजम्—माला; वैजयन्तीम्—अत्यन्त अलंकृत तथा बड़ी; मधुना—शहद से; मत्त— मतवाले; षट्-पदाम्—छ: पैरों वाले भौंरों को ।.
 
अनुवाद
 
 समस्त बहुमूल्य रत्नों के स्रोत समुद्र ने उन्हें पीले रेशमी वस्त्र के ऊपर तथा नीचे के भाग प्रदान किये। जल के प्रधान देवता वरुण ने फूलों की मालाएँ प्रदान कीं जिनके चारों ओर मधु पीकर मस्त हुए भौंरे मँडरा रहे थे।
 
तात्पर्य
 अभिषेक उत्सव में अर्चाविग्रह को दूध, शहद, दही, घी, गोबर तथा गोमूत्र आदिद्र से नहलाते समय पीले वस्त्र अर्पित
किये जाने का रिवाज हैं। इस तरह लक्ष्मीजी का अभिषेक नियमपूर्वक वैदिक सिद्धान्तों के अनुसार सम्पन्न हुआ।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥