श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 16

 
श्लोक
भूषणानि विचित्राणि विश्वकर्मा प्रजापति: ।
हारं सरस्वती पद्ममजो नागाश्च कुण्डले ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
भूषणानि—तरह-तरह के गहने; विचित्राणि—सुन्दर ढंग से सजाये हुए; विश्वकर्मा प्रजापति:—ब्रह्माजी के पुत्रों प्रजापतियों में से एक जिसका नाम विश्वकर्मा था; हारम्—हार; सरस्वती—विद्या की देवी ने; पद्मम्—कमल का फूल; अज:—ब्रह्मा ने; नागा: च—तथा नागलोक के वासियों ने; कुण्डले—कान के दो कुण्डल ।.
 
अनुवाद
 
 प्रजापति विश्वकर्मा ने तरह-तरह के अलंकृत आभूषण दिये। विद्या की देवी सरस्वती ने गले का हार, ब्रह्माजी ने कमल का फूल तथा नागलोक के वासियों ने कान के कुण्डल प्रदान किये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥