श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 18

 
श्लोक
स्तनद्वयं चातिकृशोदरी समं
निरन्तरं चन्दनकुङ्कुमोक्षितम् ।
ततस्ततो नूपुरवल्गुशिञ्जितै-
र्विसर्पती हेमलतेव सा बभौ ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
स्तन-द्वयम्—उनके दो स्तन; च—भी; अति-कृश-उदरी—शरीर का मध्य भाग अत्यन्त पतला है, जिसका; समम्—समान रूप से; निरन्तरम्—लगातार; चन्दन-कुङ्कुम—चन्दन तथा लाल रंग के कुंकुम चूर्ण से; उक्षितम्—लेप किया; तत: तत:—यत्र तत्र; नूपुर—पायल का; वल्गु—अत्यन्त सुन्दर; शिञ्जितै:—मन्द झंकार करती; विसर्पती—चलती हुई; हेम-लता—सुनहरी लता; इव—सदृश; सा—वह देवी; बभौ—प्रकट हुई ।.
 
अनुवाद
 
 उनके संतुलित तथा सुस्थित दोनों स्तन चन्दन तथा कुंकुम चूर्ण से लेपित थे और उनकी कमर अत्यन्त पतली थी। जब वे इधर-उधर चलतीं तो उनके पायल मन्द झंकार करते थे और वे कोई सोने की लता के समान लगती थी।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥