श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 2

 
श्लोक
तामग्निहोत्रीमृषयो जगृहुर्ब्रह्मवादिन: ।
यज्ञस्य देवयानस्य मेध्याय हविषे नृप ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
ताम्—उस गाय को; अग्नि-होत्रीम्—अग्नि में आहुति के लिए मट्ठा, दूध तथा घी प्राप्त करने के लिए आवश्यक; ऋषय:—यज्ञ करने वाले ऋषियों ने; जगृहु:—भार सँभाला; ब्रह्म-वादिन:—वैदिक अनुष्ठानों को जानने वाले; यज्ञस्य—यज्ञ का; देव यानस्य—स्वर्ग तथा ब्रह्मलोक जाने की इच्छा को पूरी करने वाला; मेध्याय—आहुति डालने के योग्य; हविषे—घी के लिए; नृप—हे राजा ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा परीक्षित! वैदिक अनुष्ठानों से सुपरिचित ऋषियों ने उस सुरभि गाय को ले लिया जो अग्नि में आहुति डालने के लिए नितान्त आवश्यक मट्ठा, दूध तथा घी उत्पन्न करने वाली थी। उन्होंने शुद्ध घी के लिए ही ऐसा किया क्योंकि उन्हें उच्चलोकों में ब्रह्मलोक तक जाने के लिए यज्ञ सम्पन्न करने के लिए घी की आवश्यकता थी।
 
तात्पर्य
 सुरभि गाएँ सामान्यतया वैकुण्ठ लोकों में पाई जाती हैं। जैसाकि ब्रह्मसंहिता में वर्णन आया है, भगवान् कृष्ण अपने लोक गोलोक वृन्दावन में सुरभि गाएँ पालने में व्यस्त रहते हैं (सुरभीरभिपालयन्तम् )। ये गाएँ भगवान् की पालतू गाएँ हैं। सुरभि गायों से चाहे कोई कितना ही दूध ले सकता है और जितनी बार चाहे उन्हें दुह सकता है। दूसरे शब्दों
में, सुरभि गाय असीम मात्रा में दूध दे सकती है। यज्ञ सम्पन्न करने के लिए दूध आवश्यक है। मुनिगण जानते हैं कि मानव समाज के जीवन को पूर्ण बनाने के लिए दूध का प्रयोग किस तरह किया जाये। चूँकि शास्त्रों में सर्वत्र गोरक्षा की संस्तुति की गई है अतएव ब्रह्मवादियों ने सुरभि गाय का भार सँभाला क्योंकि असुरों की विशेष रुचि उसमें नहीं थी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥