श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 20

 
श्लोक
नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो
ज्ञानं क्‍वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् ।
कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जय:
स ईश्वर: किं परतोव्यपाश्रय: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
नूनम्—निश्चय ही; तप:—तपस्या; यस्य—जिस किसी की; न—नहीं; मन्यु—क्रोध; निर्जय:—जीता हुआ; ज्ञानम्—ज्ञान; क्वचित्—किसी साधु पुरुष में; तत्—वह; च—भी; न—नहीं; सङ्ग-वर्जितम्—संगति के कलुष से रहित; कश्चित्—कोई; महान्—अत्यन्त प्रतिष्ठित व्यक्ति; तस्य—उसका; न—नहीं; काम—भौतिक इच्छाएँ; निर्जय:—विजित; स:—ऐसा व्यक्ति; ईश्वर:—नियन्ता; किम्—वह कैसे हो सकता है; परत:—अन्यों का; व्यपाश्रय:—अधीन ।.
 
अनुवाद
 
 सभा का निरीक्षण करते हुए लक्ष्मीजी ने इस प्रकार सोचा: जिसने महान् तपस्या की है उसने अभी तक क्रोध पर विजय नहीं पाई। किसी के पास ज्ञान है, तो वह भौतिक इच्छाएँ नहीं जीत पाया। कोई महान् पुरुष है, तो उसने कामेच्छाएँ नहीं जीतीं। यहाँ तक कि महापुरुष भी किसी अन्य बात पर आश्रित रहता है। फिर वह परम नियन्ता (ईश्वर) कैसे हो सकता है?
 
तात्पर्य
 यहाँ पर परम नियन्ता अर्थात् ईश्वर के अनुसन्धान का प्रयास हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर या नियन्ता माना जा सकता है, किन्तु फिर भी ऐसे नियन्ता अन्यों द्वारा नियंत्रित होते हैं। उदाहरणार्थ, भले ही किसी ने कठोर तपस्या क्यों न की हो फिर भी वह क्रोध के वशीभूत रहता है। विश्लेषण करने पर हमें पता चलता है कि प्रत्येक
व्यक्ति किसी अन्य वस्तु से नियंत्रित होता है। अतएव भगवान् कृष्ण के अतिरिक्त कोई भी अन्य व्यक्ति असली नियन्ता नहीं हो सकता। इसकी पुष्टि शास्त्रों द्वारा होती है। ईश्वर: परम: कृष्ण:—कृष्ण परम नियन्ता हैं। वे कभी किसी के द्वारा नियंत्रित नहीं होते क्योंकि वे सबके नियन्ता हैं (सर्वकारणकारणम् )।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥