श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 21

 
श्लोक
धर्म: क्‍वचित् तत्र न भूतसौहृदं
त्याग: क्‍वचित् तत्र न मुक्तिकारणम् ।
वीर्यं न पुंसोऽस्त्यजवेगनिष्कृतं
न हि द्वितीयो गुणसङ्गवर्जित: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
धर्म:—धर्म; क्वचित्—भले ही पूरा ज्ञान क्यों न हो; तत्र—वहाँ; न—नहीं; भूत-सौहृदम्—अन्य जीवों के साथ मित्रता; त्याग:—त्याग; क्वचित्—किसी के पास भले ही हो; तत्र—वहाँ; न—नहीं; मुक्ति-कारणम्—मुक्ति का कारण; वीर्यम्—बल; न—नहीं; पुंस:—किसी पुरुष का; अस्ति—हो सकता है; अज-वेग-निष्कृतम्—काल की शक्ति से छुटकारा नहीं है; न—न तो; हि—निस्सन्देह; द्वितीय:—दूसरा; गुण-सङ्ग-वर्जित:—प्रकृति के गुणों के कल्मष से पूरी तरह मुक्त ।.
 
अनुवाद
 
 भले ही किसी के पास धर्म का पूरा ज्ञान क्यों न हो फिर भी वह समस्त जीवों पर दयालु नहीं हो सकता। किसी में, चाहे वह देवता हो या मनुष्य, त्याग हो सकता है, किन्तु वह मुक्ति का कारण नहीं होता। भले ही किसी में महान् बल क्यों न हो फिर भी वह नित्य काल की शक्ति को रोकने में अक्षम रहता है। भले ही कोई भौतिक जगत की आसक्ति से विरक्त हो चुका हो फिर भी वह भगवान् की बराबरी नहीं कर सकता। अतएव कोई भी व्यक्ति प्रकृति के भौतिक गुणों के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में धर्म: क्वचित् तत्र न भूत सौहृदम् कथन अत्यन्त सारगर्भित है। हम वास्तव में देखते हैं कि ऐसे कितने ही हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध तथा अन्य सम्प्रदाय वाले धार्मिक लोग हैं, जो अपने-अपने धर्मों का दृढ़ता से पालन करते हैं, किन्तु वे सभी जीवो पर समभाव नहीं रखते। निस्सन्देह, वे अपने को धार्मिक तो कहते हैं, किन्तु बेचारे पशुओं का वध करते रहते हैं। ऐसा धर्म निरर्थक होता है। श्रीमद्भागवत का (१.२.८) कथन है—
धर्म: स्वनुष्ठित: पुंसां विष्वक्सेनकथासु य:।

नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम हि केवलम् ॥

कोई अपने सम्प्रदाय के धार्मिक सिद्धान्तों को पालने में कितना ही पटु क्यों न हो, किन्तु यदि उसमें भगवान् से प्रेम करने की प्रवृत्ति नहीं पाई जाती तो उसके द्वारा धार्मिक सिद्धान्तों का पालन समय का अपव्यय मात्र है। मनुष्य को वासुदेव से प्रेम करने की भावना विकसित करनी चाहिए (वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:)। भक्त का लक्षण यही है कि वह हर एक का मित्र होता है (सुहृदं सर्वभूतानाम् )। भक्त धर्म के नाम पर बेचारे पशुओं का वध नहीं होने देगा। बनावटी धार्मिक पुरुष तथा भगवद्भक्त के बीच यही अन्तर होता है।

हम देखते हैं कि इतिहास में अनेक वीर पुरुष उत्पन्न हुए हैं, किन्तु वे भी क्रूर काल के हाथों से बच नहीं पाये। यहाँ तक कि सबसे बड़ा वीर पुरुष भी, जब कृष्ण काल-रूप में आते हैं, भगवान् की शासनशक्ति से बच नहीं सकता। इसका वर्णन स्वयं कृष्ण ने किया है—मृत्यु: सर्वहरश्चाहम्—भगवान् मृत्यु रूप में प्रकट होकर वीर पुरुष की तथाकथित शक्ति को छीन लेते हैं। यहाँ तक कि हिरण्यकशिपु भी अपने को नहीं बचा पाया जब उसके समक्ष नृसिंहदेव कालरूप में प्रकट हुए। किसी की भौतिक शक्ति या पराक्रम भगवान् की शक्ति के सामने शून्य है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥