श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 22

 
श्लोक
क्‍वचिच्चिरायुर्न हि शीलमङ्गलं
क्‍वचित् तदप्यस्ति न वेद्यमायुष: ।
यत्रोभयं कुत्र च सोऽप्यमङ्गल:
सुमङ्गल: कश्च न काङ्‌क्षते हि माम् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
क्वचित्—कोई; चिर-आयु:—दीर्घआयु वाला; न—नहीं; हि—निस्सन्देह; शील-मङ्गलम्—अच्छा आचरण या कल्याण; क्वचित्—कोई; तत् अपि—अच्छा आचरण होते भी; अस्ति—है; न—नहीं; वेद्यम् आयुष:—उम्र की अवधि से परिचित; यत्र उभयम्—यदि दोनों हुए (आचरण तथा मंगल); कुत्र—कहाँ; च—भी; स:—वह व्यक्ति; अपि—यद्यपि; अमङ्गल:—किसी और बात में अशुभ; सु-मङ्गल:—प्रत्येक प्रकार से शुभ; कश्च—कोई; न—नहीं; काङ्क्षते—इच्छा करता है; हि—निस्सन्देह; माम्—मुझको ।.
 
अनुवाद
 
 हो सकता है कि कोई दीर्घायु हो, किन्तु वह अच्छे आचरण वाला या मंगलमय न हो। किसी में मंगलमय तथा अच्छा आचरण दोनों ही पाये जा सकते हैं, किन्तु उसकी आयु की अवधि निश्चित नहीं होती। यद्यपि शिवजी जैसे देवताओं का जीवन शाश्वत होता है, किन्तु उनकी आदतें अमंगल सूचक होती हैं—यथा श्मशान में वास। अन्य लोग सभी प्रकार से योग्य होते हुए भी भगवान् के भक्त नहीं होते।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥