श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 23

 
श्लोक
एवं विमृश्याव्यभिचारिसद्गुणै-
र्वरं निजैकाश्रयतयागुणाश्रयम् ।
वव्रे वरं सर्वगुणैरपेक्षितं
रमा मुकुन्दं निरपेक्षमीप्सितम् ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस तरह; विमृश्य—विचार-विमर्श के बाद; अव्यभिचारि-सत्-गुणै:—अद्वितीय दिव्य गुणों से; वरम्—श्रेष्ठ; निज- एक-आश्रयतया—अन्यों पर आश्रित न रहकर समस्त गुणों से युक्त होने के कारण; अगुण-आश्रयम्—समस्त दिव्य गुणों का आगार; वव्रे—स्वीकार किया; वरम्—दूल्हे के रूप में; सर्व-गुणै:—समस्त दिव्य गुणों के साथ; अपेक्षितम्—योग्य; रमा— भाग्य की देवी ने; मुकुन्दम्—मुकुन्द को; निरपेक्षम्—यद्यपि उन्होंने उसकी प्रतीक्षा नहीं की; ईप्सितम्—सर्वाधिक वांछनीय ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार पूरी तरह विचार-विमर्श करने के बाद भाग्य की देवी (लक्ष्मी) ने मुकुन्द को पति रूप में वरण कर लिया क्योंकि यद्यपि वे स्वतंत्र हैं और उन्हें उनकी कमी भी नहीं खलती थी वे समस्त दिव्य गुणों और योग शक्तियों से युक्त हैं, अतएव सर्वाधिक वांछनीय हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् मुकुन्द आत्मनिर्भर हैं। चूँकि वे पूर्णतया स्वतंत्र हैं अतएव उन्हें न ही उनके लक्ष्मीदेवी के
आश्रय की आवश्यकता थी न ही उनके सान्निध्य की। फिर भी लक्ष्मीदेवी ने उन्हें पति रूप में स्वीकार किया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥