श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 24

 
श्लोक
तस्यांसदेश उशतीं नवकञ्जमालां
माद्यन्मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टाम् ।
तस्थौ निधाय निकटे तदुर: स्वधाम
सव्रीडहासविकसन्नयनेन याता ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसके (भगवान् के); अंस-देशे—कंधों पर; उशतीम्—अत्यन्त सुन्दर; नव—नई; कञ्ज-मालाम्—कमल के फूलों की माला को; माद्यत्—मदान्ध; मधुव्रत-वरूथ—भौंरों की; गिरा—ध्वनि से; उपघुष्टाम्—गुंजार से घिरा; तस्थौ—कर रहा; निधाय—माला रखकर; निकटे—पास ही; तत्-उर:—भगवान् का वक्षस्थल; स्व-धाम—अपना असली निवास; स-व्रीड हास—लज्जा से हँसते हुए; विकसत्—चमकते; नयनेन—आँखों से; याता—इस प्रकार स्थित ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के पास जाकर लक्ष्मीजी ने नवीन कमल पुष्पों की माला उनके गले में पहना दी जिसके चारों ओर मधु की खोज में भौरें गुंजार कर रहे थे। तब भगवान् के वक्षस्थल पर स्थान पाने की आशा से वे उनकी बगल में खड़ी रहीं और उनका मुख लज्जा से मुस्का रहा था।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥