श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 26

 
श्लोक
शङ्खतूर्यमृदङ्गानां वादित्राणां पृथु: स्वन: ।
देवानुगानां सस्त्रीणां नृत्यतां गायतामभूत् ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
शङ्ख—शंख; तूर्य—तुरही; मृदङ्गानाम्—तथा विभिन्न प्रकार के ढोलों का; वादित्राणाम्—वाद्य-यंत्रों की; पृथु:—अत्यधिक; स्वन:—ध्वनि; देव-अनुगानाम्—उच्चलोकों (गंधर्व तथा चारण लोक) के निवासी जो देवताओं के अनुयायी होते हैं; स- स्त्रीणाम्—अपनी-अपनी पत्नियों के साथ; नृत्यताम्—नाचने में व्यस्त; गायताम्—गाते हुए; अभूत्—हो गये ।.
 
अनुवाद
 
 तब गन्धर्व तथा चारण लोकों के निवासियों ने अपने-अपने वाद्य यंत्र—यथा शंख, तुरही तथा ढोल—बजाये। वे अपनी-अपनी पत्नियों के साथ नाचने गाने लगे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥