श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 27

 
श्लोक
ब्रह्मरुद्राङ्गिरोमुख्या: सर्वे विश्वसृजो विभुम् ।
ईडिरेऽवितथैर्मन्त्रैस्तल्ल‍िङ्गै: पुष्पवर्षिण: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
ब्रह्म—ब्रह्माजी; रुद्र—शिवजी; अङ्गिर:—अंगिरा मुनि; मुख्या:—आदि; सर्वे—सभी ने; विश्व-सृज:—विश्व की व्यवस्था के निदेशक; विभुम्—महान् पुरुष को; ईडिरे—पूजा की; अवितथै:—असली; मन्त्रै:—उच्चारण द्वारा; तत्-लिङ्गै:—उन भगवान् को पूजकर; पुष्प-वर्षिण:—पुष्पों की वर्षा करके ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा जी, शिव जी, अंगिरा मुनि तथा विश्व व्यवस्था के ऐसे ही निदेशकों ने फूल बरसाये और भगवान् की दिव्य महिमा के सूचक मंत्रों का उच्चारण किया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥