श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 28

 
श्लोक
श्रियावलोकिता देवा: सप्रजापतय: प्रजा: ।
शीलादिगुणसम्पन्ना लेभिरे निर्वृतिं पराम् ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
श्रिया—लक्ष्मी द्वारा; अवलोकिता:—कृपापूर्वक देखे जाने पर; देवा:—सारे देवता; स-प्रजापतय:—प्रजापतियों सहित; प्रजा:—तथा उनकी सन्तानें; शील-आदि-गुण-सम्पन्ना:—सबके सब अच्छे आचरण तथा अच्छे लक्षणों से सम्पन्न; लेभिरे— प्राप्त किया; निर्वृतिम्—संतोष; पराम्—चरम ।.
 
अनुवाद
 
 सभी प्रजापतियों तथा उनकी प्रजा सहित सारे देवता लक्ष्मीजी की चितवन से धन्य होकर तुरन्त ही अच्छे आचरण तथा दिव्य गुणों से सम्पन्न हो गये। इस तरह वे अत्यधिक सन्तुष्ट हो गये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥