श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 30

 
श्लोक
अथासीद् वारुणी देवी कन्या कमललोचना ।
असुरा जगृहुस्तां वै हरेरनुमतेन ते ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
अथ—तत्पश्चात् (लक्ष्मीजी के प्रकट होने के बाद); आसीत्—था; वारुणी—वारुणी; देवी—देवपत्नी जो मद्यपों को वश में रखती है; कन्या—तरुणी; कमल-लोचना—कमल जैसे नेत्र वाली; असुरा:—असुरों ने; जगृहु:—स्वीकार कर लिया; ताम्— उसको; वै—निस्सन्देह; हरे:—भगवान् के; अनुमतेन—आदेश से; ते—वे (राक्षस) ।.
 
अनुवाद
 
 तब कमलनयनी देवी वारुणी प्रकट हुई जो मद्यपों को वश में रखती है। भगवान् कृष्ण की अनुमति से बलि महाराज इत्यादि असुरों ने उस तरुणी को अपने अधिकार में ले लिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥