श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 31

 
श्लोक
अथोदधेर्मथ्यमानात् काश्यपैरमृतार्थिभि: ।
उदतिष्ठन्महाराज पुरुष: परमाद्भ‍ुत: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—तत्पश्चात्; उदधे:—क्षीरसागर से; मथ्यमानात्—मथने से; काश्यपै:—कश्यप के पुत्रों अर्थात् देवताओं तथा असुरों द्वारा; अमृत-अर्थिभि:—मन्थन से अमृत पाने के लिए उत्सुक; उदतिष्ठत्—वहाँ प्रकट हुआ; महाराज—हे राजा; पुरुष:—एक पुरुष; परम—अत्यन्त; अद्भुत:—अद्भुत ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा! तत्पश्चात् जब कश्यप के पुत्र—असुर तथा देवता—दोनों ही क्षीरसागर के मन्थन में लगे हुए थे तो एक अत्यन्त अद्भुत पुरुष प्रकट हुआ।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥