श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 33

 
श्लोक
पीतवासा महोरस्क: सुमृष्टमणिकुण्डल: ।
स्‍निग्धकुञ्चितकेशान्तसुभग: सिंहविक्रम: ।
अमृतापूर्णकलसं बिभ्रद् वलयभूषित: ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
पीत-वासा:—पीले वस्त्र पहने; महा-उरस्क:—चौे वक्षस्थल वाला; सु-मृष्ट-मणि-कुण्डल:—मोतियों के बने पालिश किए हुए कुण्डल पहने; स्निग्ध—चिकना; कुञ्चित-केश—घुंघराले बाल; अन्त—सिरे पर; सु-भग:—पृथक् तथा सुन्दर; सिंह विक्रम:—सिंह की भाँति बलवान्; अमृत—अमृत से; आपूर्ण—लबालब; कलसम्—कलश; बिभ्रत्—चलायमान; वलय— बाजूबंद; भूषित:—सुशोभित ।.
 
अनुवाद
 
 वह पीले वस्त्र पहने था और उसके कानों में मोतियों के बने पालिश किए हुए कुण्डल थे। उसके बालों के सिरे तेल से चुपड़े थे और उसका वक्षस्थल अत्यन्त चौड़ा था। उसका शरीर अत्यन्त सुगठित तथा सिंह के समान बलवान् था। उसने बाजूबंद पहन रखे थे। उसके हाथ में अमृत से पूर्ण कलश था।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥