श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 34

 
श्लोक
स वै भगवत: साक्षाद्विष्णोरंशांशसम्भव: ।
धन्वन्तरिरिति ख्यात आयुर्वेदद‍ृगिज्यभाक् ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; वै—निस्सन्देह; भगवत:—भगवान् का; साक्षात्—प्रत्यक्ष; विष्णो:—भगवान् विष्णु का; अंश-अंश-सम्भव:— स्वांश के स्वांश का अवतार; धन्वन्तरि:—धन्वन्तरि; इति—इस प्रकार; ख्यात:—प्रसिद्ध; आयु:-वेद-दृक्—औषधि विज्ञान में पटु; इज्य-भाक्—यज्ञ में भाग पाने का अधिकारी देवता ।.
 
अनुवाद
 
 यह व्यक्ति धन्वन्तरि था, जो भगवान् विष्णु के स्वांश का स्वांश था। वह औषधि विज्ञान (आयुर्वेद) में अत्यन्त पटु था और देवता के रूप में यज्ञों में भाग पाने का अधिकारी था।
 
तात्पर्य
 श्रील मध्वाचार्य की टीका है—
तेषां सत्याच्चालनार्थं हरिर्धन्वन्तरिर्विभु:।

समर्थोऽप्यसुराणां तु स्वहस्तादमुचत्सुधाम् ॥

हाथ में अमृत का घट लिए धन्वन्तरि भगवान् का स्वांश अवतार था। यद्यपि वह अत्यन्त बलशाली था, किन्तु असुरगण उसके हाथ से अमृत घट छीन लेने में सफल हुए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥