श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 37

 
श्लोक
इति तद्दैन्यमालोक्य भगवान्भृत्यकामकृत् ।
मा खिद्यत मिथोऽर्थं व: साधयिष्ये स्वमायया ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस तरह; तत्—देवताओं की; दैन्यम्—खिन्नता, विषाद; आलोक्य—देखकर; भगवान्—भगवान्; भृत्य-काम-कृत्— जो अपने सेवकों की इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं; मा खिद्यत—मत दुखी होओ; मिथ:—झगड़े से; अर्थम्—अमृत प्राप्त करने के लिए; व:—तुम सबके लिए; साधयिष्ये—सम्पन्न करूँगा; स्व-मायया—अपनी शक्ति से ।.
 
अनुवाद
 
 अपने भक्तों की मनोकामनाओं को सदा पूरा करने की इच्छा रखने वाले भगवान् ने जब यह देखा कि देवतागण खिन्न हैं, तो उन्होंने उनसे कहा “दु:खी मत होओ। मैं अपनी शक्ति से असुरों में झगड़ा करा कर उन्हें मोहग्रस्त कर लूँगा। इस प्रकार तुम लोगों की अमृत प्राप्त करने की इच्छा मैं पूरी कर दूँगा।”
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥