श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 39-40

 
श्लोक
देवा: स्वं भागमर्हन्ति ये तुल्यायासहेतव: ।
सत्रयाग इवैतस्मिन्नेष धर्म: सनातन: ॥ ३९ ॥
इति स्वान्प्रत्यषेधन्वै दैतेया जातमत्सरा: ।
दुर्बला: प्रबलान् राजन्गृहीतकलसान् मुहु: ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
देवा:—देवता; स्वम् भागम्—अपना-अपना हिस्सा; अर्हन्ति—लेने के अधिकारी हैं; ये—जो-जो; तुल्य-आयास-हेतव:— जिन्होंने समान प्रयास किया है; सत्र-यागे—यज्ञ सम्पन्न करने में; इव—उसी प्रकार; एतस्मिन्—इस मामले में; एष:—यह; धर्म:—धर्म; सनातन:—शाश्वत; इति—इस प्रकार; स्वान्—अपनों में; प्रत्यषेधन्—एक दूसरे को मना किया; वै—निस्सन्देह; दैतेया:—दिति के पुत्र; जात-मत्सरा:—ईष्यालु; दुर्बला:—निर्बल; प्रबलान्—बलपूर्वक; राजन्—हे राजा; गृहीत—ग्रहण किये; कलसान्—अमृत पात्र को; मुहु:—निरन्तर ।.
 
अनुवाद
 
 कुछ असुरों ने कहा “सभी देवताओं ने क्षीरसागर के मन्थन में हाथ बँटाया है। चूँकि हर एक को समान अधिकार है कि वह किसी भी सार्वजनिक यज्ञ में भाग लें अत: सनातन धर्म के अनुसार यह उचित होगा कि अमृत में देवताओं को भी भाग मिले।” हे राजा! इस प्रकार निर्बल असुरों ने प्रबल असुरों को अमृत लेने से मना किया।
 
तात्पर्य
 अमृत पाने की इच्छा वाले निर्बल असुरों ने देवताओं के पक्ष में बातें कहीं। स्वाभाविक था कि निर्बल दैत्यों ने प्रबल दैत्यों को बिना बँटवारा
किये अमृत पीने से रोकने के लिए देवताओं का समर्थन किया। इस प्रकार जब एक दूसरे को अमृत पीने से रोका गया तो असहमति से झगड़ा उठ खड़ा हुआ।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥