श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 4

 
श्लोक
तत ऐरावतो नाम वारणेन्द्रो विनिर्गत: ।
दन्तैश्चतुर्भि: श्वेताद्रेर्हरन्भगवतो महिम् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; ऐरावत: नाम—ऐरावत नामक; वारण-इन्द्र:—हाथियों का राजा; विनिर्गत:—निकला; दन्तै:—अपने दाँतों सहित; चतुर्भि:—चार; श्वेत—सफेद; अद्रे:—पर्वत के; हरन्—मात करते हुए; भगवत:—शिवजी का; महिम्—यश, महिमा ।.
 
अनुवाद
 
 मन्थन के फलस्वरूप अगली बार हाथियों का राजा ऐरावत उत्पन्न हुआ। यह हाथी श्वेत रंग का था और अपने चारों दाँतों के कारण यह शिवजी के यशस्वी धाम कैलाश पर्वत की महिमा को भी मात दे रहा था।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥