श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 41-46

 
श्लोक
एतस्मिन्नन्तरे विष्णु: सर्वोपायविदीश्वर: ।
योषिद्रूपमनिर्देश्यं दधार परमाद्भ‍ुतम् ॥ ४१ ॥
प्रेक्षणीयोत्पलश्यामं सर्वावयवसुन्दरम् ।
समानकर्णाभरणं सुकपोलोन्नसाननम् ॥ ४२ ॥
नवयौवननिर्वृत्तस्तनभारकृशोदरम् ।
मुखामोदानुरक्तालिझङ्कारोद्विग्नलोचनम् ॥ ४३ ॥
बिभ्रत् सुकेशभारेण मालामुत्फुल्ल‍मल्ल‍िकाम् ।
सुग्रीवकण्ठाभरणं सुभुजाङ्गदभूषितम् ॥ ४४ ॥
विरजाम्बरसंवीतनितम्बद्वीपशोभया ।
काञ्‍च्या प्रविलसद्वल्गुचलच्चरणनूपुरम् ॥ ४५ ॥
सव्रीडस्मितविक्षिप्तभ्रूविलासावलोकनै: ।
दैत्ययूथपचेत:सु काममुद्दीपयन् मुहु: ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
एतस्मिन् अन्तरे—इस घटना के बाद; विष्णु:—भगवान् विष्णु ने; सर्व-उपाय-वित्—विभिन्न परिस्थितियों से निपटने में पटु; ईश्वर:—परम नियन्ता; योषित्-रूपम्—सुन्दर स्त्री का रूप; अनिर्देश्यम्—कोई यह निश्चित नहीं कर सका कि वह कौन थी; दधार—धारण कर लिया; परम—परम; अद्भुतम्—अद्भुत; प्रेक्षणीय—देखने में सुहावना; उत्पल-श्यामम्—नवीन विकसित कमल के समान श्याम रंग का; सर्व—सारे; अवयव—शरीर के अंग; सुन्दरम्—अत्यन्त सुन्दर; समान—एकसमान; कर्ण- आभरणम्—कान के आभूषण; सु-कपोल—सुन्दर गाल; उन्नस-आननम्—मुखमण्डल में उभरी नाक; नव-यौवन—नवीन युवावस्था; निर्वृत्त-स्तन—स्थिर उरोज; भार—भार; कृश—अत्यन्त दुबली तथा पतली; उदरम्—कमर; मुख—मुखमण्डल; आमोद—आनन्द उत्पादक; अनुरक्त—आकृष्ट; अलि—भौंरे; झङ्कार—गुन-गुन की आवाज करते; उद्विग्न—चिन्ता से; लोचनम्—उसकी आँख; बिभ्रत्—चलायमान; सु-केश-भारेण—सुन्दर बालों के भार से; मालाम्—फूल की माला से; उत्फुल्ल-मल्लिकाम्—पूर्ण विकसित मल्लिका के फूलों से बनी; सु-ग्रीव—सुन्दर गर्दन; कण्ठ-आभरणम्—सुन्दर रत्नों से जटित; सु-भुज—सुन्दर भुजाएँ; अङ्गद-भूषितम्—बाजूबंदों से सज्जित; विरज-अम्बर—अत्यन्त स्वच्छ वस्त्र; संवीत—फैला; नितम्ब—नितम्ब; द्वीप—द्वीप की तरह लगने वाला; शोभया—ऐसी सुन्दरता से; काञ्च्या—करधनी; प्रविलसत्—फैली हुई; वल्गु—अत्यन्त सुन्दर; चलत्-चरण-नूपुरम्—हिलते-डुलते पायल; स-व्रीड-स्मित—सलज्ज हास; विक्षिप्त—दृष्टि फेरते; भ्रू विलास—भौंहों का क्रियाकलाप; अवलोकनै:—देखने से; दैत्य-यूथ-प—असुरों के नायक; चेत:सु—हृदय में; कामम्— कामेच्छा; उद्दीपयत्—जगाते हुए; मुहु:—निरन्तर ।.
 
अनुवाद
 
 तब, किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करने में दक्ष भगवान् विष्णु ने एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर लिया। स्त्री के रूप में यह अवतार—मोहिनी मूर्ति—मन को भाने वाला था। उसका रंग नव-विकसित श्यामल कमल के रंग का था और उसके शरीर का हर अंग सुन्दर ढंग से बना था। उसके कानों में कुण्डल सजे थे, उसके गाल अतीव सुन्दर थे, उसकी नाक उठी हुई थी और उसका मुखमण्डल युवावस्था की कान्ति से युक्त था। उसके बड़े-बड़े स्तनों के कारण उसकी कमर अत्यन्त पतली लगती थी। उसके मुख तथा शरीर की सुगंधि से आकर्षित भौरें उसके चारों ओर गुनगुना रहे थे और उसकी आँखें चंचल थीं। उसके बाल अत्यन्त सुन्दर थे और उन पर मल्लिका के फूलों की माला पड़ी थी। उसकी आकर्षक गर्दन हार तथा अन्य आभूषणों से सुशोभित थी; उसकी बाँहों में बाजूबंद शोभित हो रहे थे; उसका शरीर स्वच्छ साड़ी से ढका था और उसके स्तन सुन्दरता के सागर में द्वीपों की तरह प्रतीत हो रहे थे। उसके पाँवों में पायल शोभा दे रहे थे। जब वह लज्जा से हँसती और असुरों पर बाँकी चितवन फेरती तो उसकी भौंहों के हिलने से सारे असुर कामेच्छा से पूरित हो उठते और उनमें से हर एक उसे अपना बनाने की इच्छा करने लगा।
 
तात्पर्य
 असुरों में काम-भावना जगाने के लिए भगवान् ने सुन्दर स्त्री का जो
रूप धारण किया उसकी सुन्दरता का यहाँ पूरा वर्णन किया गया है।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कंध के अन्तर्गत “क्षीरसागर का मन्थन” नामक आठवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥