श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 5

 
श्लोक
ऐरावणादयस्त्वष्टौ दिग् गजा अभवंस्तत: ।
अभ्रमुप्रभृतयोऽष्टौ च करिण्यस्त्वभवन्नृप ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
ऐरावण-आदय:—ऐरावण इत्यादि; तु—लेकिन; अष्टौ—आठ; दिक्-गजा:—ऐसे हाथी जो किसी भी दिशा में जा सकते थे; अभवन्—उत्पन्न हुए; तत:—तत्पश्चात्; अभ्रमु-प्रभृतय:—अभ्रमु नामक हथिनी तथा अन्य; अष्टौ—आठ; च—भी; करिण्य:— हथिनियाँ; तु—निस्सन्देह; अभवन्—उत्पन्न हुईं; नृप—हे राजा ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा! इसके बाद आठ बड़े-बड़े हाथी उत्पन्न हुए जो किसी भी दिशा में जा सकते थे। उनमें ऐरावण प्रमुख था। अभ्रमु आदि आठ हथिनियाँ भी उत्पन्न हुईं।
 
तात्पर्य
 आठों हाथियों के नाम थे—ऐरावण, पुण्डरीक, वामन, कुमुद,
अञ्जन, पुष्पदन्त, सार्वभौम तथा सुप्रतीक।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥