श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 6

 
श्लोक
कौस्तुभाख्यमभूद् रत्नं पद्मरागो महोदधे: ।
तस्मिन् मणौ स्पृहां चक्रे वक्षोऽलङ्करणे हरि: ।
ततोऽभवत् पारिजात: सुरलोकविभूषणम् ।
पूरयत्यर्थिनो योऽर्थै: शश्वद् भुवि यथा भवान् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
कौस्तुभ-आख्यम्—कौस्तुभ के रूप में विख्यात; अभूत्—उत्पन्न हुआ; रत्नम्—बहुमूल्य मणि; पद्मराग:—पद्मराग नामक रत्न; महा-उदधे:—महान् क्षीरसागर से; तस्मिन्—उस; मणौ—मणि में; स्पृहाम् चक्रे—पाने की अभिलाषा की; वक्ष:-अलङ्करणे— अपने वक्षस्थल को अलंकृत करने के लिए; हरि:—भगवान् ने; तत:—तत्पश्चात्; अभवत्—उत्पन्न हुआ; पारिजात:—पारिजात नामक स्वर्गिक पुष्प; सुर-लोक-विभूषणम्—स्वर्गलोक को विभूषित करने वाला; पूरयति—पूरा करता है; अर्थिन:—धन की इच्छा रखने वाले; य:—जो; अर्थै:—अर्थ (इच्छित) के द्वारा; शश्वत्—सदैव; भुवि—इस लोक पर; यथा—जिस तरह; भवान्—आप (महाराज परीक्षित) ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् महान् समुद्र से विख्यात रत्न कौस्तुभ मणि तथा पद्मराग मणि उत्पन्न हुए। भगवान् विष्णु ने अपने वक्षस्थल को अलंकृत करने के लिए इसे पाने की इच्छा व्यक्त की। तब पारिजात पुष्प उत्पन्न हुआ जो स्वर्ग लोकों को विभूषित करता है। हे राजा! जिस प्रकार तुम इस लोक के प्रत्येक व्यक्ति की इच्छाएँ पूरी करते हो उसी तरह पारिजात हरएक की इच्छाओं को पूरा करता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥