श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 7

 
श्लोक
ततश्चाप्सरसो जाता निष्ककण्ठ्य: सुवासस: ।
रमण्य: स्वर्गिणां वल्गुगतिलीलावलोकनै: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; च—भी; अप्सरस:—अप्सरालोक के वासी; जाता:—उत्पन्न हुए; निष्क-कण्ठ्य:—सुनहरे हारों से अलंकृत; सु-वासस:—सुन्दर वस्त्र पहने; रमण्य:—अत्यन्त सुन्दर तथा आकर्षक; स्वर्गिणाम्—स्वर्गलोक के निवासियों का; वल्गु-गति लीला-अवलोकनै:—मन्द गति से चलती हुई सबके हृदयों को आकृष्ट करतीं ।.
 
अनुवाद
 
 अप्सराएँ (जो स्वर्ग में वेश्याओं की तरह रहती हैं) प्रकट हुईं। वे सोने के आभूषणों तथा गले की मालाओं से पूरी तरह सजी हुई थीं और महीन तथा आकर्षक वस्त्र धारण किये थीं। अप्सराएँ अत्यन्त मन्दगति से आकर्षक शैली में चलती हैं जिससे स्वर्गलोक के निवासी मोहित हो जाते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥