श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 8

 
श्लोक
ततश्चाविरभूत् साक्षाच्छ्री रमा भगवत्परा ।
रञ्जयन्ती दिश: कान्त्या विद्युत् सौदामनी यथा ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; च—तथा; आविरभूत्—प्रकट हुई; साक्षात्—प्रत्यक्ष; श्री—धन की देवी; रमा—रमा नामक; भगवत्-परा— भगवान् के प्रति पूर्णतया अनुरक्त; रञ्जयन्ती—प्रकाशित करती; दिश:—सभी दिशाओं को; कान्त्या—कान्ति से; विद्युत्— बिजली; सौदामनी—सौदामनी; यथा—जिस तरह ।.
 
अनुवाद
 
 तब धन की देवी रमा प्रकट हुईं जो भगवान् द्वारा भोग्या हैं और उन्हीं को समर्पित रहती हैं। वे बिजली की भाँति प्रकट हुईं और उनकी कांति संगमरमर के पर्वत को प्रकाशित करने वाली बिजली को मात कर रही थीं।
 
तात्पर्य
 श्री का अर्थ है ऐश्वर्य। कृष्ण समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी हैं।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोक महेश्वरम्।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥

यह विश्व-शान्ति का गुर भगवद्गीता (५.२९) में दिया हुआ है। जब लोग जान जाएँगे कि भगवान् कृष्ण ही परम भोक्ता हैं, परम स्वामी तथा समस्त जीवों के परम सुहृद हैं, तो सारे विश्व में शान्ति तथा समृद्धि निश्चित रूप से छा जाएगी। दुर्भाग्यवश, बद्धजीव भगवान् की बहिरंगा शक्ति द्वारा भ्रम में पड़े रहने के कारण एक दूसरे से लडऩा-झगडऩा चाहते हैं जिससे शान्ति भंग होती है। शान्ति के लिए पहली शर्त है कि श्री या धन की देवी द्वारा प्रदत्त सारी सम्पत्ति भगवान् को अर्पित की जाये। प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह संसारी सम्पत्ति के अपने झूठे स्वामित्व को त्याग दे और प्रत्येक वस्तु कृष्ण को अर्पित करे। कृष्णभावनामृत आन्दोलन की यही शिक्षा है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥