श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  »  श्लोक 9

 
श्लोक
तस्यां चक्रु: स्पृहां सर्वे ससुरासुरमानवा: ।
रूपौदार्यवयोवर्णमहिमाक्षिप्तचेतस: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
तस्याम्—उसके लिए; चक्रु:—की; स्पृहाम्—इच्छा; सर्वे—हर कोई; स-सुर-असुर-मानवा:—देवता, असुर तथा मनुष्य समेत; रूप-औदार्य—अपूर्व सौन्दर्य तथा शारीरिक स्वरूप के द्वारा; वय:—तारुण्य; वर्ण—रंग; महिमा—यश; आक्षिप्त—क्षुब्ध; चेतस:—मन वाले ।.
 
अनुवाद
 
 उनके अपने अपूर्व सौन्दर्य, शारीरिक स्वरूप (गठन), तारुण्य, रंग तथा यश के कारण हर व्यक्ति, यहाँ तक कि देवता, असुर तथा मनुष्य उनको पाने की कामना करने लगे। वे इसीलिए आकृष्ट थे क्योंकि रमादेवी समस्त ऐश्वर्यों की उद्गम हैं।
 
तात्पर्य
 इस संसार में ऐसा कौन होगा जो धन, सौन्दर्य तथा इन ऐश्वर्यों से मिलने वाले सामाजिक सम्मान का भूखा न हो? लोग सामान्यतया भौतिक भोग, भौतिक ऐश्वर्य तथा उच्चकुलीन परिवार के सदस्यों की संगति चाहते हैं (भोगैश्वर्य प्रसक्तानाम् )। भौतिक भोग का अर्थ है धन, सौन्दर्य तथा इनसे मिलने वाला यश जो धन की देवी की कृपा से ही प्राप्त किये जा सकते हैं। किन्तु धन की देवी कभी अकेली नहीं रहती। जैसाकि पिछले श्लोक में भगवत्-परा शब्द से सूचित होता है, वे भगवान् की सम्पत्ति हैं और उन्हीं के द्वारा भोग्या हैं। यदि कोई धन की देवी, माता लक्ष्मी की कृपा का इच्छुक है, तो उसे चाहिए कि वह उन्हें नारायण के साथ रखे क्योंकि वे स्वभाव से भगवत्-परा हैं। जो भक्त सदैव नारायण की सेवा में लगे रहते हैं (नारायणपरायण) उन्हें
निश्चय ही धन की देवी की कृपा प्राप्त हो सकती है, किन्तु जो भौतिकतावादी उन्हें निजी भोग के लिए प्राप्त करना चाहते हैं, वे निराश होते हैं। उनकी यह नीति ठीक नहीं है। उदाहरणार्थ, सुप्रसिद्ध असुर रावण रामचन्द्र को लक्ष्मी अर्थात् सीताजी से विहीन करके विजयी बनना चाहता था, किन्तु परिणाम उल्टा निकला। भगवान् रामचन्द्र ने निस्सन्देह, सीता को बलपूर्वक ले लिया और रावण अपने समूचे भौतिक साम्राज्य सहित विनष्ट हो गया। धन की देवी सबके लिए, जिसमें मनुष्य भी सम्मिलित हैं, अमीष्ट हैं, किन्तु मनुष्य को यह समझना चाहिए कि धन की देवी केवल भगवान् की ही सम्पत्ति है। कोई भी व्यक्ति धन की देवी का तब तक कृपापात्र नहीं बन पाता जब तक वह उनकी तथा परम भोक्ता भगवान् दोनों की स्तुति नहीं करता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥