श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 8: क्षीरसागर का मन्थन  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में बताया गया है कि किस तरह समुद्र मन्थन के दौरान लक्ष्मीजी प्रकट हुईं और उन्होंने विष्णुजी को किस तरह अपना पति स्वीकार कर लिया। आगे चलकर इस अध्याय में बताया गया है कि जब अमृत-पात्र लेकर धन्वन्तरि प्रकट हुए तो असुरों ने तुरन्त ही वह पात्र उनसे छीन लिया, किन्तु भगवान् विष्णु मोहिनी के रूप में प्रकट हो गए। मोहिनी संसार की सर्वाधिक सुन्दर स्त्री थी और असुरों को मोहने तथा देवताओं हेतु अमृत बचाने के लिए प्रकट हुई थी।
जब शिवजी सारा विष पी गये तो देवता तथा असुर दोनों में उत्साह बढ़ा और उन्होंने मन्थन का कार्य फिर शुरू कर दिया। इस मन्थन से, पहले एक सुरभि गाय उत्पन्न हुई। महान् साधु पुरुषों ने इस गाय को स्वीकार किया जिससे उन्हें इसके दूध से घी मिल सके और जिससे वे महान् यज्ञों में इस घी की आहुतियाँ दे सकें। तत्पश्चात् उच्चै:श्रवा नामक घोड़ा उत्पन्न हुआ। इस घोड़े को बलि महाराज ने ले लिया। तब ऐरावत तथा अन्य हाथी प्रकट हुए जो किसी भी दिशा में कहीं भी जा सकते थे। तत्पश्चात् हथिनियाँ भी प्रकट हुईं। कौस्तुभ नामक मणि भी उत्पन्न हुआ जिसे विष्णु ने लेकर अपने वक्षस्थल पर धारण कर लिया। फिर पारिजात पुष्प तथा ब्रह्माण्ड की सुन्दरतम स्त्रियाँ, अप्सराएँ, उत्पन्न हुईं। तब लक्ष्मीजी निकलीं जिनकी पूजा देवताओं, महान् ऋषियों, गन्धर्वों तथा अन्यों ने आदर सहित की। लक्ष्मीजी को ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जिसे वे पति रूप में स्वीकार करतीं। अन्ततोगत्वा उन्होंने भगवान् विष्णु को अपना स्वामी चुना। भगवान् विष्णु ने उन्हें सदा-सदा के लिए अपने वक्षस्थल पर रहने का स्थान दे दिया। लक्ष्मी तथा नारायण के इस मिलन से वहाँ पर उपस्थित देवता तथा अन्य सामान्य लोग अत्यधिक प्रसन्न हुए। किन्तु असुरगण लक्ष्मीजी द्वारा उपेक्षित होने के कारण अत्यधिक हताश थे। फिर वारुणी अर्थात् सुरापान की देवी उत्पन्न हुई और भगवान् विष्णु के आदेश से असुरों ने उसे स्वीकार कर लिया। तब असुर तथा देवता नवीकृत उत्साह से पुन: मन्थन करने लगे। इस बार भगवान् विष्णु के अंशावतार धन्वन्तरि प्रकट हुए। वे अत्यन्त सुन्दर थे और अमृत से युक्त एक पात्र लिये हुए थे। असुरों ने उनके हाथ से तुरन्त ही वह पात्र छीन लिया और भागने लगे। देवतागण अत्यन्त खिन्न होने के कारण विष्णु की शरण में गये। धन्वन्तरि से अमृत-पात्र छीनने के बाद असुरगण परस्पर लडऩे लगे। भगवान् विष्णु ने देवताओं को सान्त्वना प्रदान की जिससे वे लड़े नहीं अपितु मौन रहे। जब असुरगण परस्पर लड़ रहे थे तो साक्षात् भगवान् मोहिनी अवतार के रूप में प्रकट हुए जो ब्रह्माण्ड में सर्वाधिक सुन्दरी थी।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥