श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 9: मोहिनी-मूर्ति के रूप में भगवान् का अवतार  »  श्लोक 13

 
श्लोक
इत्यभिव्याहृतं तस्या आकर्ण्यासुरपुङ्गवा: ।
अप्रमाणविदस्तस्यास्तत् तथेत्यन्वमंसत ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; अभिव्याहृतम्—कहे गये शब्द; तस्या:—उसके; आकर्ण्य—सुनकर; असुर-पुङ्गवा:—असुरों में प्रधान; अप्रमाण-विद:—चूँकि वे सभी मूर्ख थे; तस्या:—उसका; तत्—वे वचन; तथा—ऐसा ही हो; इति—इस प्रकार; अन्वमंसत— स्वीकार करने के लिए राजी हो गये ।.
 
अनुवाद
 
 असुरों के प्रधान निर्णय लेने में अधिक पटु नहीं थे। अतएव मोहिनी मूर्ति के मधुर शब्दों को सुनकर उन्होंने तुरन्त हामी भर दी और कहा “हाँ, आपने जो कहा है, वह बिल्कुल ठीक है।” इस तरह असुर उसका निर्णय स्वीकार करने के लिए राजी हो गए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥