श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 9: मोहिनी-मूर्ति के रूप में भगवान् का अवतार  »  श्लोक 25

 
श्लोक
चक्रेण क्षुरधारेण जहार पिबत: शिर: ।
हरिस्तस्य कबन्धस्तु सुधयाप्लावितोऽपतत् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
चक्रेण—चक्र से; क्षुर-धारेण—छुरे जैसा तेज; जहार—काट दिया; पिबत:—अमृत पीते हुए; शिर:—सिर; हरि:—भगवान् ने; तस्य—राहु का; कबन्ध: तु—किन्तु शिरविहीन शरीर; सुधया—अमृत के द्वारा; अप्लावित:—स्पर्श न होने से; अपतत्—मृत होकर गिर पड़ा ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् हरि ने छुरे के समान तेज धार वाले अपने चक्र को चला कर तुरन्त ही राहु का सिर छिन्न कर दिया। जब राहु का सिर उसके शरीर से कट गया तो वह शरीर अमृत का स्पर्श न करने के कारण जीवित नहीं रह पाया।
 
तात्पर्य
 जब मोहिनी-मूर्ति रूप भगवान् ने राहु के सिर को उसके शरीर से छिन्न कर दिया तो सिर तो जीवित रहा, किन्तु शरीर मृत हो गया। राहु मुख से अमृत पी रहा था और इसके पूर्व कि अमृत शरीर में प्रवेश
करे, उसका सिर काट दिया गया। इस तरह राहु का सिर तो जीवित रहा, किन्तु उसका शरीर मृत हो गया। भगवान् द्वारा सम्पन्न यह अद्भुत कार्य यह दिखाने के लिए था कि अमृत अद्भुत देव-आहार है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥