श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 9: मोहिनी-मूर्ति के रूप में भगवान् का अवतार  »  श्लोक 28

 
श्लोक
एवं सुरासुरगणा: समदेशकाल-
हेत्वर्थकर्ममतयोऽपि फले विकल्पा: ।
तत्रामृतं सुरगणा: फलमञ्जसापु-
र्यत्पादपङ्कजरज:श्रयणान्न दैत्या: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; सुर—देवता; असुर-गणा:—तथा असुर; सम—समान; देश—स्थान; काल—समय; हेतु—कारण; अर्थ—उद्देश्य; कर्म—कर्म; मतय:—अभिलाषा; अपि—यद्यपि एक; फले—फल में; विकल्पा:—समान नहीं; तत्र—वहाँ पर; अमृतम्—अमृत; सुर-गणा:—देवता; फलम्—फल; अञ्जसा—आसानी से, पूरी तरह, प्रत्यक्षत:; आपु:—प्राप्त; यत्—जिससे; पाद-पङ्कज—भगवान् के चरणकमलों की; रज:—केसर की धूलि; श्रयणात्—आश्रय ग्रहण करने या वर प्राप्त करने से; न— नहीं; दैत्या:—असुरगण ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि देवताओं तथा असुरों के देश, काल, कारण, उद्देश्य, कर्म तथा अभिलाषा एक-जैसे थे, किन्तु देवताओं को एक प्रकार का फल मिला और असुरों को दूसरे प्रकार का। चूँकि देवता सदैव भगवान् के चरणकमलों की धूलि की शरण में रहते हैं अतएव वे बड़ी आसानी से अमृत पी सके और उसका फल भी पा सके। किन्तु भगवान् के चरणकमलों का आश्रय न ग्रहण करने के कारण असुर मनवांछित फल प्राप्त करने में असमर्थ रहे।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (४.११) में कहा गया है—ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्— भगवान् परम न्यायकर्ता हैं, जो विभिन्न मनुष्यों को उनके चरणकमलों की शरण में जाने के अनुसार पुरस्कृत करते या दण्ड देते हैं। अतएव यह वस्तुत: देखा जा सकता है कि यद्यपि कर्मी तथा भक्त एक ही स्थान पर, एक ही काल में, एक ही जैसी शक्ति तथा एक सी अभिलाषा से कार्य करते हैं, किन्तु उन्हें पृथक्-पृथक् फल प्राप्त होते हैं। कर्मी जन्म-मृत्यु के चक्र में बँधकर विभिन्न शरीरों में देहान्तर करते हैं—कभी ऊपर जाते हैं, तो कभी नीचे और इस तरह कर्मचक्र में अपने कर्मों का फल भोगते हैं। किन्तु भक्त भगवान् के चरणों में पूर्णतया समर्पण करने के कारण कभी भी अपने प्रयासों में असफल नहीं होते। यद्यपि वे बाह्य रूप से कर्मियों की तरह ही कर्म करते हैं, किन्तु वे भगवद्धाम को वापस जाते हैं और प्रत्येक प्रयास में सफल होते हैं। असुरों या नास्तिकों को अपने प्रयासों पर विश्वास रहता है, फिर भी वे अहर्निश कठोर परिश्रम करके भी अपने भाग्य से अधिक प्राप्त नहीं कर पाते। किन्तु भक्त कर्मफलों को पार करके बिना प्रयास के ही अद्भुत फल प्राप्त कर सकते हैं। यह भी कहा गया है—फलेन परिचीयते—किसी कार्य की सफलता या असफलता उसके फल से जानी जाती है। ऐसे अनेक कर्मी होते हैं, जो भक्तों के वेश में रहते हैं, किन्तु भगवान् उनके प्रयोजन को जान सकते हैं। कर्मीजन भगवान् की सम्पत्ति का उपयोग अपनी स्वार्थपूर्ण इन्द्रियतृप्ति के लिए करना चाहते हैं, किन्तु भक्त उसे ईश्वर की सेवा में लगाना चाहते हैं। अतएव भक्त सदैव कर्मी से पृथक् रहता है भले ही कर्मीजन भक्तों का वेश बना लें। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (३.९) में यों हुई है—यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:। जो भगवान् विष्णु के लिए कर्म करता है, वह इस भौतिक जगत से मुक्त होता है और इस शरीर को त्यागकर भगवद्धाम को जाता है। किन्तु कर्मी बाह्यरूप से भक्त-जैसा कर्म करने पर भी अपने अभक्तिमय कर्म में फँस जाता है और इस तरह संसार के क्लेशों को भोगता है। इस तरह कर्मियों तथा भक्तों द्वारा प्राप्त फलों से भगवान् का अस्तित्व समझा जा सकता है, जो कर्मियों तथा ज्ञानियों के साथ भक्तों की तुलना में भिन्न रूप से व्यवहार करते हैं। अत: श्रीचैतन्य-चरितामृत का लेखक कहता है—
कृष्णभक्त—निष्काम, अतएव ‘शान्त’ भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी—सकलि ‘अशान्त’ इन्द्रियतृप्ति चाहने वाले कर्मी, ब्रह्म में विलीन होने की मुक्ति की अभिलाषा करने वाले ज्ञानी तथा योगशक्ति में भौतिक सफलता की खोज करने वाले योगी—ये सभी अशान्त रहते हैं और अन्ततोगत्वा निराश हो जाते हैं। किन्तु भक्त, जो अपने किसी निजी लाभ की आशा नहीं करता और जिसकी एकमात्र अभिलाषा भगवान् की महिमा को प्रसारित करने की रहती है, बिना कठिन श्रम के भक्तियोग के समस्त शुभफल पाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥