श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 1: राजा सुद्युम्न का स्त्री बनना  »  श्लोक 13

 
श्लोक
अप्रजस्य मनो: पूर्वं वसिष्ठो भगवान् किल ।
मित्रावरुणयोरिष्टिं प्रजार्थमकरोद् विभु: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
अप्रजस्य—नि:सन्तान; मनो:—मनु के; पूर्वम्—पहले; वसिष्ठ:—मुनि वसिष्ठ; भगवान्—शक्तिशाली; किल—निस्सन्देह; मित्रा वरुणयो:—मित्र तथा वरुण नामक देवताओं का; इष्टिम्—यज्ञ; प्रजा-अर्थम्—पुत्र प्राप्ति के लिए; अकरोत्—सम्पन्न किया; विभु:—महापुरुष ने ।.
 
अनुवाद
 
 आरम्भ में मनु के एक भी पुत्र नहीं था। अतएव उसे पुत्रप्राप्ति के लिए आध्यात्मिक ज्ञान में अत्यन्त शक्तिशाली मुनि वसिष्ठ ने मित्र तथा वरुण देवताओं को प्रसन्न करने के लिए एक यज्ञ सम्पन्न किया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥